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  • टीबी के खिलाफ उम्मीद की नई मिसाल: जशपुर के निरंजन बने 60 मरीजों का सहारा, पीवीटीजी परिवारों तक पहुंचाई पोषण और जीवन की नई आस

    टीबी के खिलाफ उम्मीद की नई मिसाल: जशपुर के निरंजन बने 60 मरीजों का सहारा, पीवीटीजी परिवारों तक पहुंचाई पोषण और जीवन की नई आस

    टीबी के खिलाफ लड़ाई में आगे आएं, बनें किसी मरीज की उम्मीद

    जशपुर में विशेष पिछड़ी जनजाति (पीवीटीजी) के 19 मरीजों सहित 60 टीबी रोगियों को गोद लेकर पोषण सहायता प्रदान कर रहे हैं निरंजन

    रायपुर : टीबी केवल एक बीमारी नहीं है। यह गरीबी, कुपोषण और सामाजिक उपेक्षा से जुड़ी ऐसी चुनौती है, जो हर साल हजारों परिवारों को आर्थिक और मानसिक संकट में धकेल देती है। जब कोई व्यक्ति टीबी से ग्रसित होता है, तब उसके सामने केवल दवा लेने की चुनौती नहीं होती, बल्कि पौष्टिक भोजन जुटाने, नियमित उपचार जारी रखने और सामाजिक भेदभाव से लड़ने जैसी अनेक कठिनाइयाँ भी खड़ी हो जाती हैं। यही कारण है कि देशव्यापी प्रधानमंत्री टीबी मुक्त भारत अभियान में “निक्षय मित्र” की अवधारणा को विशेष महत्व दिया गया है।

     विशेषज्ञों का मानना है कि टीबी के उपचार में दवा जितनी आवश्यक है, उतना ही आवश्यक है पर्याप्त पोषण। लेकिन दूरस्थ और आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों के लिए यह सबसे बड़ी चुनौती बन जाती है। कई मरीज केवल इसलिए उपचार बीच में छोड़ देते हैं क्योंकि उनके पास पोषणयुक्त भोजन की व्यवस्था नहीं होती। ऐसे समय में निक्षय मित्र न केवल पोषण सहायता प्रदान करते हैं, बल्कि मरीजों के मनोबल को भी मजबूत बनाते हैं।

     छत्तीसगढ़ के जशपुर जिले से ऐसी ही एक प्रेरणादायक कहानी सामने आई है। जिले के दूरस्थ और दुर्गम क्षेत्रों में निवासरत विशेष पिछड़ी जनजातियों (PVTG) के बीच स्वास्थ्य एवं सामाजिक जागरूकता के क्षेत्र में कार्य करते हुए राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन कार्यरत जिला डाटा प्रबंधक निरंजन प्रसाद गुप्ता ने अक्टूबर 2024 से निक्षय मित्र के रूप में जिम्मेदारी संभाली। उन्होंने न केवल पीवीटीजी समुदाय के 19 टीबी मरीजों को गोद लिया, बल्कि जिले के कुल 60 टीबी मरीजों को नियमित रूप से पोषण आहार एवं आवश्यक सहयोग प्रदान कर उपचार की राह में उनका साथ निभाया।

     जशपुर के पहाड़ी कोरवा और बिरहोर जैसे विशेष पिछड़ी जनजातीय समुदायों में टीबी की रोकथाम, समय पर पहचान और उपचार सुनिश्चित करना हमेशा चुनौतीपूर्ण रहा है। ऐसे क्षेत्रों में स्वास्थ्य सेवाओं तक पहुंच सीमित होने के कारण मरीज अक्सर उपचार में देरी कर देते हैं। इन्हीं परिस्थितियों को देखते हुए मरीजों को पोषण सहायता, स्वास्थ्य परामर्श और निरंतर मार्गदर्शन उपलब्ध कराया गया, जिससे उपचार की निरंतरता बनी रही।

     निरंजन गुप्ता की पहल केवल पोषण किट तक सीमित नहीं रही। उन्होंने घर-घर पहुंचकर मरीजों और उनके परिजनों को टीबी के लक्षणों, नियमित दवा सेवन, संक्रमण से बचाव तथा उपचार पूरा करने के महत्व के बारे में विस्तार से जानकारी दी। इस सतत संवाद का सकारात्मक प्रभाव यह हुआ कि समुदाय में स्वास्थ्य सेवाओं के प्रति विश्वास बढ़ा और लोग स्वयं स्वास्थ्य संस्थानों तक पहुंचने लगे।

     टीबी के खिलाफ लड़ाई में दवा और निदान जितने महत्वपूर्ण हैं, उतना ही महत्वपूर्ण है पोषण और सामाजिक सहयोग। कुपोषण और टीबी का संबंध एक दुष्चक्र की तरह है कुपोषण से बीमारी बढ़ती है और बीमारी से कुपोषण। ऐसे में निक्षय मित्र द्वारा दिया गया पोषण सहयोग मरीज की रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने और उपचार को सफल बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। इन उल्लेखनीय प्रयासों के लिए निरंजन गुप्ता को दिसंबर 2024 में राज्य स्तरीय निक्षय मित्र पुरस्कार से सम्मानित किया गया।

     टीबी मुक्त भारत का लक्ष्य केवल स्वास्थ्य विभाग का लक्ष्य नहीं है। यह समाज के हर उस व्यक्ति का दायित्व है जो किसी जरूरतमंद के जीवन में सकारात्मक बदलाव ला सकता है। जशपुर की यह पहल बताती है कि एक व्यक्ति भी यदि संवेदनशीलता के साथ आगे आए, तो वह दर्जनों परिवारों के जीवन में नई उम्मीद जगा सकता है। आज आवश्यकता है कि अधिक से अधिक नागरिक, संस्थाएं और सामाजिक संगठन निक्षय मित्र बनकर इस राष्ट्रीय अभियान से जुड़ें, ताकि कोई भी टीबी मरीज केवल संसाधनों के अभाव में उपचार से वंचित न रहे।

  • माँ का पहला दूध है नवजात का सबसे बड़ा सुरक्षा कवच! प्रदेशभर में शुरू हुआ विश्व स्तनपान सप्ताह, स्वास्थ्य विभाग का विशेष अभियान

    माँ का पहला दूध है नवजात का सबसे बड़ा सुरक्षा कवच! प्रदेशभर में शुरू हुआ विश्व स्तनपान सप्ताह, स्वास्थ्य विभाग का विशेष अभियान

    माँ के दूध से स्वस्थ जीवन की मजबूत शुरुआत, प्रदेशभर में विश्व स्तनपान सप्ताह की शुरुआत

    जन्म के पहले घंटे में स्तनपान और पहले छह माह तक केवल मां का दूध पिलाने पर विशेष जोर, स्वास्थ्य संस्थानों में जागरूकता गतिविधियां जारी

    रायपुर : हर नवजात को जीवन की स्वस्थ और सुरक्षित शुरुआत मिले, इसी उद्देश्य के साथ प्रदेशभर में विश्व स्तनपान सप्ताह की शुरुआत हो गई है। स्वास्थ्य विभाग द्वारा सप्ताहभर अस्पतालों, सामुदायिक एवं प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों, स्वास्थ्य एवं कल्याण केंद्रों तथा समुदाय स्तर पर विविध जागरूकता गतिविधियों का आयोजन किया जा रहा है। अभियान के माध्यम से माताओं, गर्भवती महिलाओं और उनके परिजनों को स्तनपान के महत्व तथा उसके वैज्ञानिक लाभों की जानकारी दी जा रही है।

    स्वास्थ्य विशेषज्ञों का कहना है कि शिशु के जन्म के पहले घंटे के भीतर स्तनपान शुरू करना और पहले छह माह तक केवल मां का दूध पिलाना उसके स्वस्थ विकास की सबसे मजबूत नींव है। मां का पहला गाढ़ा पीला दूध (कोलोस्ट्रम) शिशु के लिए प्राकृतिक सुरक्षा कवच की तरह कार्य करता है। यह संक्रमण से बचाने, रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने तथा कुपोषण के जोखिम को कम करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। छह माह तक केवल स्तनपान कराने के बाद शिशु को उम्र के अनुरूप ऊपरी आहार के साथ दो वर्ष या उससे अधिक समय तक स्तनपान जारी रखने की सलाह दी जाती है।

     स्तनपान केवल शिशु के लिए ही नहीं, बल्कि मां के स्वास्थ्य के लिए भी अत्यंत लाभकारी है। इससे प्रसव के बाद मां के स्वास्थ्य में तेजी से सुधार होता है, कुछ गंभीर बीमारियों का खतरा कम होता है तथा मां और शिशु के बीच भावनात्मक संबंध भी अधिक मजबूत बनता है।

    विश्व स्तनपान सप्ताह के दौरान स्वास्थ्य संस्थानों में गर्भवती एवं धात्री माताओं की काउंसलिंग, समूह चर्चा, स्वास्थ्य शिक्षा सत्र, प्रश्नोत्तर कार्यक्रम तथा स्तनपान संबंधी व्यवहारिक मार्गदर्शन दिया जा रहा है। चिकित्सक, स्टाफ नर्स, एएनएम, मितानिन, आंगनबाड़ी कार्यकर्ता और अन्य स्वास्थ्यकर्मी माताओं को सही स्तनपान तकनीक, नवजात की देखभाल तथा स्तनपान से जुड़े सामान्य भ्रमों के वैज्ञानिक समाधान भी बता रहे हैं।

     स्तनपान को केवल मां की जिम्मेदारी न मानकर पूरे परिवार की साझा जिम्मेदारी समझें। परिवार का सहयोग, सकारात्मक वातावरण और सही जानकारी ही प्रत्येक नवजात को स्वस्थ जीवन की बेहतर शुरुआत दे सकती है। जनभागीदारी और जागरूकता के माध्यम से मातृ एवं शिशु स्वास्थ्य सेवाओं में और अधिक सुधार लाया जा सकता है तथा कुपोषण मुक्त और स्वस्थ समाज के निर्माण की दिशा में महत्वपूर्ण कदम बढ़ाया जा सकता है।

  • टीबी के खिलाफ जशपुर में महाअभियान! दूरस्थ पीवीटीजी गांवों में घर-घर पहुंचकर मरीजों को मिल रही पोषण सहायता और इलाज

    टीबी के खिलाफ जशपुर में महाअभियान! दूरस्थ पीवीटीजी गांवों में घर-घर पहुंचकर मरीजों को मिल रही पोषण सहायता और इलाज

    प्रधानमंत्री टीबी मुक्त भारत अभियान के तहत पीवीटीजी क्षेत्रों में पोषण सहायता एवं जागरूकता अभियान जारी

    जशपुर : प्रधानमंत्री टीबी मुक्त भारत अभियान के अंतर्गत जशपुर जिले के दूरस्थ पीवीटीजी क्षेत्रों में टीबी मरीजों की शीघ्र पहचान, नियमित उपचार, पोषण सहायता एवं स्वास्थ्य जागरूकता के लिए विशेष अभियान संचालित किया जा रहा है।

     जिले के सभी पीवीटीजी टीबी मरीजों को गोद लेकर उन्हें उपचार अवधि में नियमित निक्षय पोषण आहार किट एवं आवश्यक सहयोग प्रदान किया जा रहा है।

    01 अगस्त 2026 को बगीचा विकासखंड के ग्राम गायबुड़ा, महादेवजोबला, रोकड़ापाठ एवं भट्टीकोना में नव-पंजीकृत चार टीबी मरीजों से उनके घर पहुँचकर मुलाकात की गई तथा पोषण आहार किट वितरित की गई। पीवीटीजी हेल्पडेस्क के सहयोग से स्वास्थ्य परीक्षण, आवश्यक दवाइयां का वितरण एवं परिवारजनों की स्क्रीनिंग भी की गई।

    इस दौरान मरीजों एवं ग्रामीणों को टीबी के लक्षण, नियमित दवा सेवन, उपचार पूर्ण करने तथा समय पर जाँच कराने के संबंध में जागरूक किया गया। अभियान के सकारात्मक परिणामस्वरूप समुदाय में स्वास्थ्य सेवाओं के प्रति विश्वास बढ़ा है तथा टीबी सहित अन्य स्वास्थ्य कार्यक्रमों में जनभागीदारी सुदृढ़ हुई है। जिले में टीबी उन्मूलन के लक्ष्य की प्राप्ति हेतु ऐसे अभियान आगे भी निरंतर जारी रहेंगे।

  • मलेरिया पर सबसे बड़ा वार! जंगलों में उतरी स्वास्थ्य विभाग की टीम, संवेदनशील वनांचलों में घर-घर जांच, 24 घंटे के भीतर इलाज और हर संदिग्ध मरीज पर कड़ी निगरानी के निर्देश

    मलेरिया पर सबसे बड़ा वार! जंगलों में उतरी स्वास्थ्य विभाग की टीम, संवेदनशील वनांचलों में घर-घर जांच, 24 घंटे के भीतर इलाज और हर संदिग्ध मरीज पर कड़ी निगरानी के निर्देश

    मलेरिया के खिलाफ जंगलों में उतरा स्वास्थ्य महकमा, संवेदनशील इलाकों की परखी तैयारियां

    कोटा एवं लोरमी के वनांचल क्षेत्रों का मैदानी निरीक्षण, शत-प्रतिशत सर्विलांस, त्वरित जांच और उपचार सुनिश्चित करने के दिए निर्देश

    रायपुर : प्रदेश में वर्षा ऋतु के दौरान मलेरिया एवं अन्य वेक्टर जनित रोगों की रोकथाम को सर्वोच्च प्राथमिकता देते हुए स्वास्थ्य विभाग ने संवेदनशील वनांचल क्षेत्रों में निगरानी एवं नियंत्रण गतिविधियों को और अधिक सुदृढ़ किया है। इसी क्रम में राज्य स्तरीय अधिकारियों ने बिलासपुर जिले के कोटा विकासखंड तथा मुंगेली जिले के लोरमी विकासखंड के दूरस्थ वन क्षेत्रों का मैदानी निरीक्षण एवं सहायक पर्यवेक्षण  किया। निरीक्षण के दौरान मलेरिया नियंत्रण गतिविधियों की जमीनी स्थिति का आकलन कर प्रत्येक संवेदनशील क्षेत्र तक समयबद्ध जांच, उपचार एवं निगरानी सुनिश्चित करने पर विशेष जोर दिया गया।

    निरीक्षण के दौरान अचानकमार, कोटा सहित दूरस्थ वन क्षेत्र बस्तियों का भ्रमण कर वहां संचालित मलेरिया नियंत्रण गतिविधियों का सूक्ष्मता से मूल्यांकन किया गया। अधिकारियों ने कहा कि आजीविका के लिए जंगलों में निवास करने वाले परिवारों तक भी स्वास्थ्य सेवाओं की नियमित पहुंच सुनिश्चित करना विभाग की सर्वोच्च प्राथमिकताओं में शामिल है, ताकि कोई भी संवेदनशील आबादी मलेरिया जांच एवं उपचार से वंचित न रहे।

    मैदानी भ्रमण के दौरान जिला स्वास्थ्य अमले को सभी वन बस्तियों एवं वैकल्पिक आवासीय स्थलों में शत-प्रतिशत सक्रिय मलेरिया सर्विलांस संचालित करने, प्रत्येक परिवार की लाइन लिस्टिंग तैयार करने, रैपिड डायग्नोस्टिक टेस्ट (RDT) किट एवं मलेरिया रोधी दवाओं की पर्याप्त उपलब्धता सुनिश्चित करने तथा प्रत्येक संदिग्ध मरीज की तत्काल जांच एवं उपचार करने के निर्देश दिए गए। साथ ही नियमित फील्ड मॉनिटरिंग को और अधिक प्रभावी बनाते हुए संभावित संक्रमण वाले क्षेत्रों पर विशेष निगरानी बनाए रखने के भी निर्देश दिए गए।

    निरीक्षण एवं पर्यवेक्षण के दौरान संभागीय संयुक्त संचालक डॉ. गायत्री बांधी, मुख्य चिकित्सा एवं स्वास्थ्य अधिकारी मुंगेली डॉ. शीला शाह, उप संचालक वेक्टर जनित रोग नियंत्रण कार्यक्रम डॉ. वी.आर. भगत तथा संबंधित जिलों के जिला मलेरिया अधिकारियों की टीम ने क्षेत्र में संचालित गतिविधियों, सर्विलांस व्यवस्था, जांच एवं उपचार की उपलब्धता तथा मैदानी अमले की कार्यप्रणाली का विस्तृत जायजा लिया। अधिकारियों ने जिला एवं विकासखंड स्तर पर गठित रैपिड रिस्पांस टीम (RRT) को 24×7 अलर्ट मोड पर रखने के निर्देश दिए। साथ ही यह सुनिश्चित करने को कहा गया कि किसी भी क्षेत्र से मलेरिया क्लस्टर अथवा संभावित प्रकोप की सूचना प्राप्त होने पर 24 घंटे के भीतर टीम मौके पर पहुंचकर आवश्यक नियंत्रण एवं रोकथाम की कार्रवाई प्रारंभ करे।

    मलेरिया के प्रत्येक संभावित मामले को गंभीरता से लेते हुए राज्य स्तर पर लगातार मैदानी निगरानी, नियमित समीक्षा एवं त्वरित हस्तक्षेप किया जा रहा है। विभाग का उद्देश्य वर्षा ऋतु के दौरान मलेरिया के प्रसार को प्रभावी ढंग से नियंत्रित रखते हुए प्रदेश के प्रत्येक नागरिक, विशेषकर दूरस्थ वन क्षेत्रों में रहने वाले परिवारों तक समय पर जांच, उपचार एवं आवश्यक स्वास्थ्य सेवाएं सुनिश्चित करना है। विभाग ने बुखार से पीड़ित बच्चों एवं गर्भवती महिलाओं पर विशेष ध्यान देने के निर्देश भी दिए हैं, ताकि संवेदनशील समूहों में संक्रमण की समय रहते पहचान कर प्रभावी उपचार उपलब्ध कराया जा सके।

  • बेटियों की सुरक्षा की ओर बड़ा कदम! छत्तीसगढ़ में 1.49 लाख से अधिक किशोरियों का एचपीवी टीकाकरण, सर्वाइकल कैंसर की रोकथाम के लिए स्वास्थ्य विभाग का व्यापक अभियान

    बेटियों की सुरक्षा की ओर बड़ा कदम! छत्तीसगढ़ में 1.49 लाख से अधिक किशोरियों का एचपीवी टीकाकरण, सर्वाइकल कैंसर की रोकथाम के लिए स्वास्थ्य विभाग का व्यापक अभियान

    बेटियों की सेहत को मिला सबसे बड़ा सुरक्षा कवच

    प्रदेश में 1.49 लाख किशोरियों को लगा एचपीवी टीका, सर्वाइकल कैंसर की रोकथाम की दिशा में अहम उपलब्धि

    रायपुर : सर्वाइकल कैंसर जैसी गंभीर बीमारी के खिलाफ छत्तीसगढ़ में बचाव की मजबूत नींव तैयार हो रही है। केंद्र सरकार के एचपीवी (ह्यूमन पैपिलोमा वायरस) टीकाकरण कार्यक्रम के अंतर्गत प्रदेश की 1.49 लाख से अधिक किशोरियों को एचपीवी वैक्सीन लगाई जा चुकी है। यह टीका भविष्य में सर्वाइकल कैंसर के खतरे को काफी हद तक कम करने में प्रभावी है। यही कारण है कि दुनिया भर में इसे महिलाओं के स्वास्थ्य संरक्षण के सबसे प्रभावी निवारक उपायों में शामिल किया जाता है।

    महिलाओं में सर्वाइकल कैंसर सबसे अधिक पाए जाने वाले कैंसरों में से एक है। स्वास्थ्य विशेषज्ञों का मानना है कि समय पर एचपीवी टीकाकरण और जागरूकता के माध्यम से इस बीमारी के अधिकांश मामलों को रोका जा सकता है। इसी उद्देश्य से स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण विभाग द्वारा प्रदेशभर में पात्र किशोरियों तक टीकाकरण पहुंचाने के साथ-साथ व्यापक जनजागरूकता अभियान भी चलाया जा रहा है।

    अभियान के तहत स्वास्थ्य विभाग की टीमें स्कूलों, आंगनबाड़ी केंद्रों तथा स्वास्थ्य संस्थानों में पहुंचकर किशोरियों और उनके अभिभावकों को एचपीवी संक्रमण, सर्वाइकल कैंसर के जोखिम तथा टीकाकरण के लाभों की जानकारी दे रही हैं। विभाग का प्रयास है कि पात्र आयु वर्ग की प्रत्येक किशोरी तक यह सुरक्षा कवच पहुंचे और किसी भी परिवार में जानकारी के अभाव में कोई बेटी इस महत्वपूर्ण टीके से वंचित न रह जाए।

    विशेषज्ञ बताते हैं कि एचपीवी संक्रमण सर्वाइकल कैंसर का प्रमुख कारण है। किशोरावस्था में लगाया गया एचपीवी टीका संक्रमण के जोखिम को कम करता है और आगे चलकर सर्वाइकल कैंसर होने की संभावना को भी काफी हद तक घटा देता है। यही वजह है कि इसे बीमारी के इलाज से पहले बचाव का सबसे प्रभावी माध्यम माना जाता है।

    स्वास्थ्य विभाग ने अभिभावकों से अपील की है कि 14 वर्ष की पात्र आयु वर्ग की बेटियों का एचपीवी टीकाकरण अवश्य कराएं। आज लगाया गया यह टीका आने वाले वर्षों में गंभीर बीमारी से सुरक्षा का मजबूत आधार बन सकता है।

    आप भी अपनी 14 वर्ष की बेटी को सर्वाइकल कैंसर से सुरक्षा का कवच दें। पात्र बालिकाओं के लिए एचपीवी टीका शासकीय स्वास्थ्य संस्थानों एवं निर्धारित टीकाकरण केंद्रों पर निःशुल्क उपलब्ध है।

  • अब नहीं बिकेगा ‘नकली पनीर’! उपभोक्ताओं की सेहत से खिलवाड़ करने वालों पर सरकार का बड़ा एक्शन, एनालॉग डेयरी उत्पादों पर तत्काल प्रतिबंध, उल्लंघन पर सख्त कार्रवाई की चेतावनी

    अब नहीं बिकेगा ‘नकली पनीर’! उपभोक्ताओं की सेहत से खिलवाड़ करने वालों पर सरकार का बड़ा एक्शन, एनालॉग डेयरी उत्पादों पर तत्काल प्रतिबंध, उल्लंघन पर सख्त कार्रवाई की चेतावनी

    नकली डेयरी उत्पादों पर सख्त कार्रवाई: एनालॉग पनीर के निर्माण और बिक्री पर तत्काल रोक

    उपभोक्ताओं के स्वास्थ्य की सुरक्षा के लिए शासन का बड़ा निर्णय, खाद्य कारोबार संचालकों से नियमों का कड़ाई से पालन करने की अपील

    रायपुर : उपभोक्ताओं को सुरक्षित एवं गुणवत्तापूर्ण खाद्य पदार्थ उपलब्ध कराने की दिशा में राज्य शासन ने महत्वपूर्ण कदम उठाते हुए एनालॉग पनीर तथा अन्य डेयरी एनालॉग उत्पादों के निर्माण, प्रसंस्करण, भंडारण, परिवहन, वितरण और विक्रय पर तत्काल प्रभाव से प्रतिबंध लगा दिया है। इस संबंध में लोक स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण विभाग द्वारा अधिसूचना जारी की गई है। खाद्य एवं औषधि प्रशासन, जिला गौरेला-पेंड्रा-मरवाही ने जिले के सभी खाद्य कारोबार संचालकों, डेयरी उत्पाद निर्माताओं, थोक एवं फुटकर विक्रेताओं से शासन के निर्देशों का अक्षरशः पालन करने की अपील की है।

    खाद्य एवं औषधि प्रशासन के अनुसार यह निर्णय खाद्य सुरक्षा एवं मानक अधिनियम 2006 के अंतर्गत प्रदत्त शक्तियों का प्रयोग करते हुए लिया गया है। विभागीय परीक्षण, प्रयोगशाला विश्लेषण एवं जोखिम मूल्यांकन में यह सामने आया कि कुछ उत्पाद वास्तविक दूध से निर्मित नहीं होने के बावजूद उन्हें पनीर, क्रीम, मक्खन अथवा अन्य दुग्ध उत्पादों के रूप में प्रस्तुत किया जा रहा था। इससे उपभोक्ताओं के भ्रमित होने के साथ-साथ उनके स्वास्थ्य पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ने की आशंका बनी हुई थी।

    प्रतिबंध के दायरे में ऐसे सभी उत्पाद शामिल किए गए हैं, जिनमें दूध के स्थान पर वनस्पति वसा, वनस्पति तेल अथवा अन्य गैर-दुग्ध अवयवों का उपयोग किया गया हो, अथवा जिनकी लेबलिंग, पैकेजिंग या प्रदर्शन इस प्रकार किया गया हो कि वे वास्तविक दुग्ध उत्पाद प्रतीत हों। शासन का उद्देश्य उपभोक्ताओं को भ्रामक उत्पादों से बचाना तथा खाद्य बाजार में पारदर्शिता और गुणवत्ता सुनिश्चित करना है।

    हालांकि, विभाग ने स्पष्ट किया है कि फ्रोजन डेजर्ट, प्रोसेस्ड चीज़ तथा मिक्स्ड फैट स्प्रेड जैसे वे उत्पाद, जिनके लिए भारतीय खाद्य सुरक्षा एवं मानक प्राधिकरण के मानक निर्धारित हैं और जिनकी विधिवत लेबलिंग की जाती है, इस प्रतिबंध के दायरे में शामिल नहीं होंगे।

    खाद्य एवं औषधि प्रशासन ने बताया कि यह प्रतिबंध राजपत्र में अधिसूचना प्रकाशित होने की तिथि से एक वर्ष अथवा भारतीय खाद्य सुरक्षा एवं मानक प्राधिकरण द्वारा अंतिम नियम जारी किए जाने तक, जो भी पहले हो प्रभावी रहेगा। इस अवधि में विभाग द्वारा निरीक्षण एवं निगरानी की कार्रवाई भी की जाएगी, ताकि प्रतिबंध का प्रभावी क्रियान्वयन सुनिश्चित किया जा सके।

    विभाग ने जिले के सभी डेयरी उत्पाद निर्माताओं, वितरकों, थोक एवं फुटकर विक्रेताओं से उपभोक्ता हित को सर्वाेच्च प्राथमिकता देते हुए शासन के निर्देशों का पूर्णतः पालन करने का आग्रह किया है। साथ ही चेतावनी दी गई है कि प्रतिबंधित उत्पादों के निर्माण, भंडारण अथवा विक्रय की स्थिति में संबंधित प्रावधानों के तहत विधिसम्मत कार्रवाई की जाएगी। शासन का यह निर्णय खाद्य सुरक्षा व्यवस्था को और अधिक सुदृढ़ बनाने तथा आम नागरिकों को सुरक्षित एवं गुणवत्तापूर्ण खाद्य सामग्री उपलब्ध कराने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है।

  • सालों की खामोशी टूटी, अब सुनाई देंगी दुनिया की आवाज़ें! चिरायु योजना की पहल से एम्स रायपुर में सफल कॉक्लियर इम्प्लांट, नन्हीं जीविका को मिली सुनने और बोलने की नई उम्मीद

    सालों की खामोशी टूटी, अब सुनाई देंगी दुनिया की आवाज़ें! चिरायु योजना की पहल से एम्स रायपुर में सफल कॉक्लियर इम्प्लांट, नन्हीं जीविका को मिली सुनने और बोलने की नई उम्मीद

    खामोशी में बीत रहा था बचपन, अब सुनाई देंगी दुनिया की आवाजें

    राष्ट्रीय बाल स्वास्थ्य कार्यक्रम की पहल से डुंडेरा की जीविका का एम्स रायपुर में सफल कॉक्लियर इम्प्लांट, डोंगरगढ़ की आरबीएसके टीम बनी उम्मीद की कड़ी

    रायपुर : अब तक जिस दुनिया को नन्हीं जीविका सिर्फ देखती थी, अब उसे वह सुन भी सकेगी। राजनांदगांव जिले के डोंगरगढ़ विकासखंड के ग्राम डुंडेरा की इस बच्ची के लिए राष्ट्रीय बाल स्वास्थ्य कार्यक्रम (चिरायु) किसी नई जिंदगी की शुरुआत बनकर आया है। जन्मजात श्रवण बाधिता के कारण जीविका सामान्य बच्चों की तरह सुन और बोल नहीं पा रही थी। परिवार के लिए यह चिंता का विषय था, लेकिन समय पर हुई स्वास्थ्य जांच और शासकीय स्वास्थ्य व्यवस्था के सहयोग ने उनकी उम्मीदों को नया जीवन दे दिया।

    आंगनबाड़ी केंद्र क्रमांक-1, डुंडेरा में नियमित स्वास्थ्य जांच के दौरान आरबीएसके टीम-ए, डोंगरगढ़ ने जीविका की समस्या को पहचाना। टीम ने बिना समय गंवाए आवश्यक चिकित्सकीय जांच कराई, विशेषज्ञों से परामर्श कराया और उसे एम्स रायपुर रेफर किया। यहां विशेषज्ञ चिकित्सकों ने उसका सफल कॉक्लियर इम्प्लांट किया। अब नियमित स्पीच थेरेपी और पुनर्वास के साथ जीविका धीरे-धीरे आवाजों की दुनिया से परिचित हो सकेगी और सामान्य बच्चों की तरह बोलना भी सीख पाएगी।

    राष्ट्रीय बाल स्वास्थ्य कार्यक्रम ऐसे ही हजारों बच्चों के जीवन में उम्मीद की नई किरण बन रहा है। कार्यक्रम के तहत जन्मजात विकार, पोषण संबंधी समस्याएं, विकास में देरी और अन्य गंभीर बीमारियों की समय रहते पहचान कर बच्चों को निःशुल्क उपचार उपलब्ध कराया जाता है। आवश्यकता पड़ने पर उन्हें उच्च स्वास्थ्य संस्थानों में रेफर कर आधुनिक चिकित्सा सुविधाएं भी उपलब्ध कराई जाती हैं।

    जीविका की कहानी इस बात का प्रमाण है कि यदि बीमारी की समय पर पहचान हो और उपचार सही समय पर मिले, तो कई बच्चों का भविष्य बदला जा सकता है। डोंगरगढ़ की ‘चिरायु’ टीम की सतर्कता और समन्वित प्रयासों ने एक बच्ची के जीवन में सुनहरे कल की उम्मीद जगा दी है। अब उसके घर में सिर्फ मुस्कान ही नहीं, बल्कि आवाजों की नई दुनिया भी दस्तक दे रही है।

  • पारंपरिक खेती छोड़ अपनाई हाईटेक तकनीक, 55% सरकारी अनुदान ने बदल दी किसान की किस्मत—ड्रिप सिंचाई से लागत घटी, उत्पादन और मुनाफा दोनों बढ़े

    पारंपरिक खेती छोड़ अपनाई हाईटेक तकनीक, 55% सरकारी अनुदान ने बदल दी किसान की किस्मत—ड्रिप सिंचाई से लागत घटी, उत्पादन और मुनाफा दोनों बढ़े

    सूक्ष्म सिंचाई योजना से खेती बनी अधिक लाभकारी, ड्रिप सिंचाई अपनाकर किसान ने बढ़ाया सब्जी उत्पादन

    55 प्रतिशत अनुदान से स्थापित की ड्रिप सिंचाई प्रणाली, कम पानी में बढ़ा उत्पादन और आय

    रायपुर : मुख्यमंत्री श्री विष्णुदेव साय के नेतृत्व में राज्य सरकार किसानों को आधुनिक एवं वैज्ञानिक खेती के लिए निरंतर प्रोत्साहित कर रही है। कृषि एवं उद्यानिकी विभाग की विभिन्न योजनाओं के माध्यम से किसानों को नई तकनीकों से जोड़कर उनकी आय बढ़ाने के प्रभावी प्रयास किए जा रहे हैं। इन्हीं प्रयासों के तहत संचालित सूक्ष्म सिंचाई योजना किसानों के लिए लाभकारी सिद्ध हो रही है। योजना के अंतर्गत ड्रिप एवं स्प्रिंकलर जैसी आधुनिक सिंचाई प्रणालियों पर अनुदान उपलब्ध कराया जा रहा है, जिससे कम पानी में अधिक उत्पादन संभव हो रहा है।

    सरगुजा जिले के विकासखंड लुण्ड्रा अंतर्गत ग्राम पंचायत झेराडीह के प्रगतिशील किसान श्री आनन्द राम पैकरा ने सूक्ष्म सिंचाई योजना का लाभ लेकर अपनी खेती को आधुनिक तकनीक से जोड़ा है। उनके पास कुल 0.909 हेक्टेयर कृषि भूमि है, जिसमें 0.509 हेक्टेयर में धान तथा 0.400 हेक्टेयर में टमाटर एवं गोभी जैसी सब्जियों की खेती की जाती है। उद्यानिकी विभाग के मार्गदर्शन एवं तकनीकी सहयोग से उन्होंने लगभग डेढ़ एकड़ क्षेत्र में ड्रिप सिंचाई प्रणाली स्थापित की, जिसके लिए उन्हें शासन से 55 प्रतिशत अनुदान प्राप्त हुआ।

    श्री आनन्द राम पैकरा बताते हैं कि पहले पारंपरिक सिंचाई पद्धति में अधिक पानी, समय और श्रम लगता था तथा खेत में समान रूप से सिंचाई करना कठिन होता था। ड्रिप सिंचाई प्रणाली अपनाने के बाद पानी सीधे पौधों की जड़ों तक आवश्यक मात्रा में पहुंच रहा है। इससे जल की बचत होने के साथ पौधों का विकास बेहतर हुआ है और फसल की गुणवत्ता में भी उल्लेखनीय सुधार आया है। उन्होंने बताया कि ड्रिप प्रणाली के माध्यम से उर्वरकों का उपयोग भी अधिक प्रभावी ढंग से किया जा रहा है। पौधों को आवश्यकता के अनुसार पोषक तत्व मिलने से टमाटर एवं गोभी की फसल अधिक स्वस्थ और गुणवत्तापूर्ण तैयार हो रही है। उत्पादन बढ़ने के साथ खेती की लागत में कमी आई है, जिससे सब्जी उत्पादन पहले की अपेक्षा अधिक लाभकारी बन गया है।

    राज्य शासन द्वारा सूक्ष्म सिंचाई जैसी आधुनिक तकनीकों को बढ़ावा देकर जल संरक्षण, उत्पादन वृद्धि और किसानों की आय में बढ़ोतरी के लक्ष्य को साकार किया जा रहा है। सरगुजा सहित प्रदेश के विभिन्न जिलों में किसान शासन की योजनाओं का लाभ लेकर पारंपरिक खेती से आगे बढ़ते हुए वैज्ञानिक एवं तकनीक आधारित कृषि को अपना रहे हैं, जिससे कृषि अधिक टिकाऊ, लाभकारी और आत्मनिर्भर बन रही है।

  • रबी में वर्षों तक खाली रहने वाला खेत बना सोना उगलने वाली जमीन! प्रधानमंत्री धन धान्य कृषि योजना से मिली मदद, सरसों की लहलहाती फसल ने किसान बलदेव राजवाड़े की बदल दी तस्वीर

    रबी में वर्षों तक खाली रहने वाला खेत बना सोना उगलने वाली जमीन! प्रधानमंत्री धन धान्य कृषि योजना से मिली मदद, सरसों की लहलहाती फसल ने किसान बलदेव राजवाड़े की बदल दी तस्वीर

    सफलता की कहानी : कृषक बलदेव राजवाड़े को प्रधानमंत्री धन धान्य कृषि योजना का मिला लाभ, सरसों की अच्छी खेती से किसान हुआ खुश

    जशपुर : मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय के मंशानुरूप जिले के कृषकों को कृषि विभाग के विभिन्न योजनाओं से निरंतर लाभान्वित किया जा रहा है।

    इसी कड़ी में प्रधानमंत्री धन धान्य कृषि योजना अंतर्गत घटक नेशनल मिशन ऑन एडिबल ऑइल (तिलहन) योजना के तहत बगीचा विकासखण्ड के ग्राम सुलेसा निवासी किसुन राजवाड़े को सरसों बीज कृषि विभाग से अनुदान में प्रदाय किया। कृषक श्री राजवाड़े ने 1 हे. रकबे में सरसों की खेती किया। उन्हें ग्रामीण कृषि विस्तार अधिकारी के द्वारा बीज के साथ-साथ सूक्ष्म पोषक तत्व खाद एवं दवाई भी दिया गया। जिससे लागत में कमी आयी तथा समय-समय पर कृषि विभाग के अधिकारियों के द्वारा खेत का निरीक्षण कर आवश्यक सलाह एवं मार्गदर्शन दिया। अभी कृषक की फसल काफी अच्छी स्थिति में है।

     कृषक श्री बलदेव राजवाड़े ने बताया कि उनके पास कुल 2.512 हेक्टर जमीन हैं। जिसमें सभी जमीन में खरीफ सीजन में धान की खेती करते है तथा रबी सीजन में पर्याप्त सिंचाई सुविधा न होने से खेत खाली रहता था। उन्होंने कहा कि क्षेत्र के ग्रामीण कृषि विस्तार अधिकारी श्री मनीष कुमार गुप्ता से सम्पर्क किया और उन्होने मुझे कृषि विभाग के विभिन्न योजना के सम्बन्ध में जानकारी दिया। मुझे ग्रामीण कृषि विस्तार अधिकारी के द्वारा रबी मंन सरसों फसल की खेती करने के लिए प्रोत्साहित किया। मेरी फसल का उपज अच्छा होने से मेरी खाद्य तेल की बाजार पर निर्भरता कम होगी एवं बाजार भाव अच्छा मिलता है। अन्य कृषकों को भी तिलहन फसल लगाने की सलाह देना चाहूंगा। जिससे हम खाद्य तेल के उत्पादन में आत्मनिर्भर बने एवं हमारी आय में वृद्धि हो।

  • अब नहीं बिकेगा ‘नकली पनीर’! छत्तीसगढ़ सरकार का बड़ा फैसला, दूध की जगह वनस्पति तेल से बने भ्रामक डेयरी उत्पादों पर एक साल की रोक

    अब नहीं बिकेगा ‘नकली पनीर’! छत्तीसगढ़ सरकार का बड़ा फैसला, दूध की जगह वनस्पति तेल से बने भ्रामक डेयरी उत्पादों पर एक साल की रोक

    छत्तीसगढ़ में अमानक पनीर और डेयरी एनालॉग उत्पादों पर लगा प्रतिबंध

    स्वास्थ्य मंत्री श्री श्याम बिहारी जायसवाल ने की थी घोषणा

    रायपुर : राज्य सरकार ने अमानक दुग्ध उत्पादों पर सख्त कार्रवाई करते हुए बड़ा फैसला लिया है। लोक स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण विभाग द्वारा जारी आदेश के अनुसार, छत्तीसगढ़ की पूरी सीमा में ऐसे “डेयरी एनालॉग” या गैर-दुग्ध उत्पादों के निर्माण, प्रसंस्करण, भंडारण, परिवहन, वितरण और विक्रय पर तत्काल प्रभाव से रोक लगा दी गई है, जो असली दूध उत्पाद होने का भ्रम पैदा करते हैं।

    खाद्य सुरक्षा और मानक अधिनियम, 2006 की धारा 30 एवं 18 के तहत यह कार्रवाई की गई है। आदेश में विशेष रूप से पनीर, क्रीम, मक्खन जैसे अमानकीकृत उत्पादों पर रोक लगायी गई है, जिनमें दूध के स्थान पर वनस्पति वसा या वनस्पति तेल का उपयोग किया जाता है।

    किन उत्पादों पर लागू होगा प्रतिबंध:

    – जो उत्पाद वास्तविक दुग्ध उत्पाद नहीं हैं

    – जिनमें दूध की जगह वनस्पति वसा, वनस्पति तेल या अन्य गैर-दुग्ध सामग्री का उपयोग हो

    – जिनकी लेबलिंग, पैकेजिंग या प्रदर्शन उपभोक्ताओं को गुमराह करता हो

    हालांकि फ्रोजन डेजर्ट, प्रोसेस्ड चीज़ और मिक्स्ड फैट स्प्रेड जैसे मानकीकृत उत्पादों को इस प्रतिबंध से बाहर रखा गया है।

    विभाग ने स्पष्ट किया है कि यह प्रतिबंध राजपत्र में प्रकाशन की तारीख से एक वर्ष तक, या FSSAI द्वारा अंतिम नियम जारी होने तक, जो भी पहले हो, प्रभावी रहेगा।खाद्य एवं औषधि प्रशासन द्वारा जारी विस्तृत आदेश का पालन सभी संबंधित प्राधिकारियों और खाद्य कारोबार संचालकों को करना अनिवार्य होगा।