विशेष लेख : खेलकूद, अनुशासन और राष्ट्रभावना का संगम ; लाल बहादुर शास्त्री के जीवन-दर्शन में स्वस्थ भारत की परिकल्पना

11 जनवरी भारत के पूर्व प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री जी की पुण्यतिथि : खेलकूद के प्रति शास्त्री जी का दृष्टिकोण

मेरे विचार से खेलकूद और मनुष्य का जीवन एक सिक्के के दो पहलू हैं। इस संसार में जन्म लेने वाला प्रत्येक व्यक्ति समाज के किसी ना किसी क्षेत्र से जुड़ा होता है। वह वैज्ञानिक, चिकित्सक, लेखक, विचारक, कृषक, प्रशासक या नेतृत्वकर्ता हो सकता है लेकिन खेलकूद का उसके मन मस्तिष्क में महत्व होता है। हमारे देश के प्रधानमंत्रियों में भी खेल के प्रति लगाव पाया जाता है। भारत के पूर्व प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री भी खेलकूद के प्रति दिलचस्पी रखते थे।

देश के नागरिकों को मानसिक व शारीरिक रूप से स्वस्थ रहने के लिए उन्होंने खेलकूद के महत्व को समझा। बचपन में उन्होंने स्थानीय प्रचलित खेलों का पूरा आनंद लिया। एक-दूसरे सामान्य बच्चे की तरह लाल बहादुर जी ने बचपन में खेलों में भाग लेते हुए हार व जीत के स्वाद को चखा और सफलता या असफलता का आकलन किया। यही घटनाक्रम उनके आगामी राजनीतिक जीवन के लिए लाभप्रद रहा।

क्रीड़ा के माध्यम से सबसे पहले अनुशासन व समय की पाबंदी के महत्व को शास्त्री जी ने सीखा और समझा। शास्त्री जी के सार्वजनिक जीवन पर सरसरी तौर पर नजर डालने से स्पष्ट हो जाता है कि उन्होंने खेलकूद की प्रतियोगिताओं से भी सबक लिया था। जनप्रतिनिधि होते हुए प्रधानमंत्री तक के सफर में शास्त्री जी ने कार्यकर्ताओं को अनुशासित होने और समय पर सभी कार्यों को पूरा कर लेने की सलाह देते रहे। जब वे स्वयं सांसद, केंद्रीय मंत्री या प्रधानमंत्री की जिम्मेदारी को निभाया तो उन्होंने समय पर कार्यालयीन कार्य शुरू करने और समाप्त करने का जो उदाहरण प्रस्तुत किया वह आज भी भारत के राजनेताओं के लिए चुनौती है।

जिस तरह खेल स्पर्धाओं में टीम वर्क और नेतृत्व की क्षमता की जरूरत होती है वे राजनीतिक दलों के कार्यकर्ताओं में भी इसी तरह के गुण के विकास की अपेक्षा करते थे। कामयाबी पाने के लिए जिस तरह टीम को एकता के साथ आपसी तालमेल की जरूरत होती है उसका आज के राजनैतिक परिस्थिति में विशेष स्थान है। चुनाव जीतने की रणनीति में आज भले ही कुछ तब्दीली आई है लेकिन नेतृत्व क्षमता के विकास के द्वारा जिम्मेदार नागरिक बना जा सकता है। शास्त्री जी की सोच थी कि स्वस्थ शरीर में स्वस्थ दिमाग का निवास स्थान होता है। अत: वे इस बात पर विश्वास करते थे कि खेलकूद में शामिल होना जीवन के लिए प्रतिदिन जरूरी है।

प्रधानमंत्री के पद पर होते हुए भी शास्त्री जी रोज व्यायाम करते थे क्योंकि वे मानते थे कि शारीरिक रूप से चुस्त-दुरुस्त रहने से मानसिक रूप से स्वस्थ रहा जा सकता है। शास्त्री जी मानते थे कि खेलकूद से राष्ट्रीय एकता को बढ़ावा मिलता है। एक टीम का जब चयन होता है तो उसमें जाति, धर्म, अमीर-गरीब, वर्ण, रंगभेद का कोई स्थान नहीं होता है। सब मिलकर खेलते हैं तो खिलाडिय़ों तथा नागरिकों के मन में राष्ट्रवाद की भावना बलवती होती है। इस तरह न सिर्फ खेल भावना को बढ़ावा मिलता है बल्कि देशभक्ति को मजबूती मिलती है। हम पाते हैं कि भारत के पूर्व प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री ने जहां एक ओर जय जवान, जय किसान के नारा के द्वारा हमारे देश भारत को एक सूत्र में पिरोया वही दूसरी आर खेल को समाज देश व स्वयं के लिए आवश्यक बताया।

— जसवंत क्लॉडियस
वरिष्ठ खेल पत्रकार
रायपुर, छत्तीसगढ़

Related posts