क्रिकेट के वरिष्ठ कमेंटेटर लक्ष्मण शिवरामकृष्ण ने लिया संन्यास
उभरते रंगभेद, जातिवाद, क्षेत्रवाद की भावना को होगा कुचलना
विशेष लेख – जसवंत क्लॉडियस, वरिष्ठ खेल पत्रकार, रायपुर
रायपुर : भारत जैसे लोकतंत्र में जहां मौलिक अधिकार में रंगभेद, छुआछूत, जातिवाद ,क्षेत्रवाद का कोई स्थान नहीं है उसी देश के वरिष्ठ क्रिकेटर लक्ष्मण शिवरामकृष्णन के सनसनीखेज खुलासे ने पूरे देश व क्रिकेट जगत को स्तब्ध कर दिया है। शिवरामकृष्णन कोई साधारण व्यक्तित्व नहीं है। वे क्रिकेट के पूर्व खिलाड़ी और दुनिया में जाने-माने क्रिकेट कमेंटेटर हैं जो पिछले 23 वर्षों से टेलीविजन के विभिन्न चैनल में कामेंट्री किया करते थे।
विगत दिनों उन्होंने कामेंट्री को अलविदा कह दिया। इसका कारण भी उन्होंने बताया कि कामेंट्री के 23 वर्ष के लंबे सफर में उन्हें कभी भी टास अलाउंस करने और प्रेजेंटेशन करने का मौका नहीं दिया गया। इसके बारे में उन्होंने स्वयं कहा कि शायद ऐसा उनके शारीरिक रंग के कारण संभव हुआ। लक्ष्मण शिवरामकृष्णन मूलत: तमिलनाडु के रहने वाले हैं जहां भौगोलिक परिस्थिति सालभर तापमान 20 डिग्री से कम नहीं होता। लक्ष्मण शिवरामकृष्णन अंग्रेजी बहुत शुद्ध व साफ हुआ करती थी और क्रिकेट खेल की बारीकी की काफी सटीक प्रस्तुति करते थे।
उन्होंने अपनी बातचीत या खेल के लयबद्ध वर्णन के दौरान उच्चारण के द्वारा कभी भी ऐसा नहीं होने दिया जिससे यह पता चल सके कि वे दक्षिण भारतीय हैं। शिवरामकृष्णन ने भारत के लिए नौ टेस्ट खेले और 16 वनडे में 15 विकेट हासिल किए। वे एक जुझारू खिलाड़ी थे और फारवर्ड शार्ट लेग पर पूरी चपलता व चौकसी के साथ फील्डिंग करने में माहिर थे। भारत में इस तरह रंगभेद की खबर आना इस बात का द्योतक है कि आज भी कुछ भारतीयों या भारत के वर्ग विशेष के लोगों की मानसिकता का स्तर गिरा हुआ है।
आश्चर्य की बात है कि 23 वर्षों तक कामेंट्री के माध्यम से खिलाडिय़ों, दर्शकों, खेलप्रेमियों तक खेल की बारीकियों को पहुंचाने वाले स्वयं रंगभेद के जाल में उलझकर गुमनामी में चले गये हैं। इस तरह की घटना कोई साधारण नहीं है परंतु दुर्भाग्य की बात है मीडिया यहां तक सोशल मीडिया, टीवी चैनल में रंगभेद की इस घटना का कोई उल्लेख नहीं मिलता। इससे स्पष्ट है कि मीडिया को अपने कंपनी के लिए राजस्व से मतलब है .इंडियन प्रीमियर लीग (आईपीएल) के कवरेज ने इतनी बड़ी अनहोनी को अपने आंचल से ढंक लिया।
भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड को स्वयं इस तरह के अन्याय से सजग होना चाहिए। बीसीसीआई के मीडिया विभाग ने रंगभेद के आरोप को कितनी गंभीरता से लिया है आगे चलकर उनकी क्या रणनीति होगी। इस बारे में अभी कोई प्रतिक्रिया नहीं आई है। रंगभेद नीति का विरोध करने के कारण दक्षिण अफ्रीका के पूर्व राष्ट्रपति नेल्सन मंडेला ने 26 वर्ष जेल की सजा पाई थी। रंगभेद दक्षिण अफ्रीका में 1948 से 1994 तक नेशनल पार्टी सरकार द्वारा लागू कर संस्थागत नस्लीय भेदभाव प्रणाली थी।
आखिरकार नेल्सन मंडेला के नेतृत्व में संघर्ष और अंतर्राष्ट्रीय दबाव की वजह से 1994 में लोकतांत्रिक चुनाव के साथ रंगभेद की नीति समाप्त हुई। इस नीति की वजह से प्रतिभाशाली खिलाडिय़ों को चाहे वे किसी भी खेल के खिलाड़ी हों उन्हें विश्व स्तरीय प्रतियोगिता में भाग लेने से वंचित होना पड़ा। जब लोकतंत्र में समानता व एकता का अधिकार दिया गया है तो फिर भारत में घटित इस घटना को बेहद गंभीरता से लेना चाहिए।
लक्ष्मण शिवरामकृष्णन ने महज 60 वर्ष की उम्र में रंगभेद के घुटन के कारण क्रिकेट कामेंट्री को छोड़ दिया जबकि उनसे अधिक 75 उम्र के सुनील गावस्कर जैसे खिलाड़ी आज भी कामेंट्री कर रहे हैं। भारत में कभी भी खेलकूद में जातीय या अमीर-गरीब, रंगभेद की नीति को बढ़ावा नहीं मिलना चाहिए। खिलाड़ी चाहे भारत के किसी भी कोने से हो किसी जाति का हो अगर उसमें प्रतिभा है तो उसे मौका दिया जाना चाहिए।
