वरिष्ठ खेल पत्रकार जसवंत क्लॉडियस ने उठाई खेल जगत की सबसे गंभीर चिंता—डोपिंग के काले खेल पर बेबाक कलम, बोले: पदक से बड़ा है देश का सम्मान

देश को कलंकित करने वाले गिरोह का भंडाफोड़ जरूरी

प्रतिबंधित दवा के सेवन से मिली सफलता होती है क्षणिक

आलेख.. जसवंत क्लॉडियस,वरिष्ठ स्वतंत्र खेल पत्रकार, टी वी कमेंटेटर, रायपुर,छग

रायपुर : पिछला सप्ताह भारतीय खेल संसार के लिए एक और काला अध्याय जोड़ गया। खेलकूद के माध्यम जहां खिलाड़ी अपने देश का, खुद का, परिवार का नाम रौशन करना चाहते हैं . कुछ समय बाद वही खिलाड़ी खेलकूद टूर्नामेंट के निर्धारित नियमों की धज्जियां उड़ाते हुए अपने देश का, समाज का, और खेल भावना को तार तार कर रहे होते हैं। एक खिलाड़ी का जीवन 16 से 20 वर्ष तक माना जाता है। अर्थात् खेल जीवन की शुरुआत 16 वर्ष से मान लिया जाए तो वह अधिक से अधिक 32 से 35 वर्ष की उम्र की होती है। अर्थात् 16 से 35 वर्ष के दौरान किशोर से लेकर युवा तक कैरियर बनाने की महत्वपूर्ण अवधि होती है। कैरियर किस क्षेत्र में बनाना है ?यह सब कुछ अभिभावकों, शिक्षकों, परिवार के वृद्धजनों से सलाह मशविरा करके तय किया जाता है .खिलाडिय़ों को कोई एक खेल चुनकर उसमें विशेषज्ञता हासिल करने आगे बढऩा पड़ता है। राष्ट्रीय या अंतरराष्ट्रीय स्तर का खिलाड़ी बनने के लिए त्याग, समर्पण, मेहनत ,समय की पाबंदी आदि की मिसाल पेश करनी होती है। इसके लिए एक खिलाड़ी को ना जाने हार-जीत के कितने दौर से गुजरना पड़ता है। इस दौरान लगातार असफलता प्राप्त होने पर खिलाड़ी अपने भविष्य को लेकर चिंतित हो जाता है. यही वो क्षण हेाता है कि जब खिलाड़ी विजयी होने के लिए नियम विरुद्ध कदम उठाता है। अतिरिक्त शारीरिक शक्ति प्राप्त करने के लिए खिलाड़ी ऐसी दवाइयों का इस्तेमाल करता है, जो उसके लिए प्रतिबंधित होता है. इस उपाय से खिलाड़ी हीरो तो बन जाता है लेकिन उसके मूत्र या पेशाब की जांच होती है तो वह पकड़ में आता है तथा वह हीरो से जीरो हो जाता है। भारत में इन दिनों जिस तरह विभिन्न खेलों के विजेताओं को केंद्र, राज्य सरकारों तथा सार्वजनिक क्षेत्र की संस्थाओ या निजी औद्योगिक घरानों द्वारा पैसों, जमीन, आदि से मालामाल कर दिया जाता है तो उभरता हुआ खिलाड़ी को उसके निकट मित्र और सलाहकार उसे इसी गलत मार्ग को अपनाने की सलाह देते हैं। अनुचित तरीके से मिली सफलता से खिलाड़ी यह अनुमान नही लगा पाते हैं कि उनके गलत कृत्य के उजागर होने पर उसका पुरस्कार मिट्टी में मिल जाएगा। परिवार को लज्जा झेलनी पड़ेगी और सबसे दुर्भाग्य की बात उसके कारण देश को अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर शर्मिंदा होना पड़ेगा। गत दिनों एथलेटिक्स की हेप्टाथलीट स्वप्ना जकार्ता एशियाई खेलों 2018 की स्वर्ण पदक विजेता तथा भालाफेंक के प्रतिभागी शिवपाल सिंह 2019 एशियाई एथलेटिक्स चैंपियनशिप के रजत पदक विजेता डोप टेस्ट में पकड़े गए। स्वप्ना के सैंपल में बोल्डेनोन नाम प्रतिबंधित एनाबालिक एंड्रोजेनिक स्टेारायड जबकि शिवपाल सिंह के सैंपल में मेथेनडिप्नोन नामक प्रतिबधित स्टेरापड सेवन की पुष्टि हुई। यह बेहद अफसोस की जानकारी है कि शिवपाल डोप में दूसरी बार पकड़े गए। अब शिवपाल को दस वर्ष का प्रतिबंध लगाया गया है। इस तरह अभी भी भारतीय खेल जगत को कलंकित करने वाले ना जाने कितने खिलाड़ी छुपे होंगे। उनके लिए इन दो खिलाडिय़ों पर हुई कार्यवाही एक चेतावनी है कि वे अगर सामान्य खान पान से प्रतिद्वंद्वी को पछाड़ नहीं सकते तो मैदान छोड़ दें लेकिन देश के सम्मान को ठेस न पहुंचाए। प्रतिबंधित दवा लेते हुए अभी हाल में हाकी खिलाड़ी मयंक शर्मा पर चार साल और धाविका संजना सिंह पर पांच वर्ष का प्रतिबंध लगाया गया है। राष्ट्रीय डोपिंग रोधी एजेंसी ने साफ किया है कि इस तरह के 260 प्रकरणों के साथ भारत विश्व में पिछले तीन वर्षों से प्रथम स्थान पर है। खिलाडिय़ों के साथ प्रशिक्षकों आहार विशेषज्ञों और खिलाड़ी की देखरेख कर रहे चिकित्सकों के खिलाफ भी कठोर कार्यवाही होनी चाहिए। हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि ऐसे प्रकरण बढऩे से भारत को भविष्य में हर प्रकार के खेल आयोजन से वंचित होना पड़ सकता है। खिलाडिय़ों को जागरूक करने के लिए ऐसे विषय को शिक्षा के पाठ्यक्रमों में सम्मिलित किया जाना चाहिए।

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