कुनकुरी, 16 मई 2025 | सागर जोशी
जशपुर जिले के विकासखंड कुनकुरी अंतर्गत ग्राम पंचायत बरांगजोर इन दिनों गंभीर पेयजल संकट से जूझ रहा है। भीषण गर्मी के मौसम में जब पानी जीवन की सबसे अहम आवश्यकता बन जाती है, तब इस गांव के लोग कुछ पुराने बोरिंग और गंदे कुओं पर निर्भर होकर दिन गुजारने को मजबूर हैं। पिछले कुछ वर्षों में सरकार द्वारा दो अलग-अलग पेयजल योजनाएं इस गांव में स्वीकृत और क्रियान्वित की गईं — एक 36 लाख रुपए की लागत से बनी स्थाई टंकी योजना और दूसरी ‘जल जीवन मिशन’ के तहत हर घर नल योजना। लेकिन दोनों योजनाएं ग्रामीणों को स्थायी समाधान देने में विफल रहीं। आज स्थिति यह है कि गांव की बहुसंख्यक आबादी पानी के लिए संघर्ष कर रही है, जबकि योजनाओं के नाम पर सिर्फ अधूरी पाइपलाइन, सूखी टंकियां और निराशा ही दिखाई देती है।
लाखों की योजनाएं – भ्रष्टाचार की मूक प्रतिमा
बरांगजोर में दो बड़ी योजनाएं आईं। पहली योजना में करीब 36 लाख रुपये खर्च कर एक विशाल कांक्रीट की टंकी और 1200 मीटर लंबी पाइपलाइन बिछाई गई। सरकारी दस्तावेज़ों में इसे ‘सफल’ बताया गया, लेकिन जमीनी हकीकत कुछ और ही है। टंकी से पानी सिर्फ दो दिन चला। उसके बाद नल सूख गए, और पाइपों में सिर्फ हवा चलने लगी। गांव के लोग आज भी इस टंकी को देखकर कहते हैं — “सरकार आई थी, पानी नहीं”। यह टंकी अब गांव में भ्रष्टाचार की मूक प्रतिमा बन चुकी है, जो हर दिन लोगों की उम्मीदों का अपमान करती है।
जल जीवन मिशन – जीवन से ज्यादा योजनाओं का बोझ
साल दो साल बाद फिर सरकार का एक और सपना गांव में उतरा — ‘जल जीवन मिशन’। इस योजना के तहत गांव में 10,000 लीटर की टंकी लोहे के टॉवर पर खड़ी की गई। मोटर और बोरिंग से पानी भरने की व्यवस्था भी की गई। कुछ मोहल्लों तक पानी पहुंचा भी, लेकिन कुछ ही दिनों में वह भी ठप हो गया। 45 घरों में से सिर्फ 7 घरों को पानी मिल पाया, बाकी आज भी बाल्टी लेकर पड़ोस या कुएं का सहारा लेते हैं। यह योजना भी अब एक याद बनकर रह गई है, जो हर बार उम्मीद जगा कर उसे कुचल जाती है।
सूखी टंकी – गांव की जलती हुई आत्मा
बरांगजोर में जैसे ही प्रवेश करते हैं, सामने जल जीवन मिशन की ऊंची टंकी दिखती है। यह टंकी प्रतीक है – उस वादे का जो कभी निभाया नहीं गया। नीचे गांव के बच्चे, महिलाएं, बुजुर्ग — सभी उस टंकी की ओर देखते हैं जैसे कोई सूखे कुएं में उम्मीद की डोरी फेंक रहा हो। लेकिन नल से पानी नहीं आता, और हर उम्मीद धीरे-धीरे आंखों के आंसुओं में बह जाती है।
गरीबों की जेब से निकला पानी, लेकिन प्यास नहीं बुझी
सरकारी योजनाओं के विफल होने के बाद लोगों ने खुद पैसे खर्च कर अपने घरों तक पाइपलाइन बिछवाने की कोशिश की। रतमनी बाई को नल का पानी घर तक लाने के लिए ₹1600 खर्च करने पड़े, सिद्धेश्वर नायक और राजकुमार को भी ₹1200-1200 खर्च करने पड़े। सोचिए, जहां दो वक्त की रोटी मुश्किल से जुटती हो, वहां पानी के लिए हजारों रुपये खर्च करना एक विकराल अन्याय है। लेकिन जिनके पास ये पैसे भी नहीं हैं, वे आज भी पैदल चलकर कुओं से पानी ढो रहे हैं — उनके जीवन में न योजना पहुंची, न राहत।
बुजुर्ग और महिलाएं – प्यास के सबसे खामोश सिपाही
गांव की बुजुर्ग महिलाएं और अकेली माताएं इस संकट से सबसे ज्यादा प्रभावित हैं। 70 वर्षीय रतमनी बाई रोज़ लाठी लेकर निकलती हैं, एक हाथ में बाल्टी और दूसरे में लाठी — कई बार गिरती हैं, फिर उठती हैं, क्योंकि पानी लाना ज़रूरी है। महिलाओं की पीठ पानी के बर्तनों के बोझ से झुकी हुई है, लेकिन व्यवस्था की संवेदनहीनता का बोझ उससे भी भारी है। जिन हाथों से बच्चों के लिए खाना बनना चाहिए था, वो अब टंकी से टंकी भटकते हैं। क्या यही है जल जीवन?
सरपंच की कोशिशें – सिस्टम की दीवारों से टकराते जज़्बात
नवनिर्वाचित सरपंच रोशन आरा खेस ने जब गांव की स्थिति देखी, तो उन्होंने तत्काल पीएचई विभाग से संपर्क कर बोरिंग मरम्मत करवाई। लेकिन पानी की सप्लाई सामान्य नहीं हो सकी। गांव में अब भी अधिकतर नल सूखे हैं, और लोग अब सरपंच को भी उसी नजर से देखने लगे हैं जैसे बाकी योजनाओं को — ‘आएंगे, कुछ दिन दिखेंगे, फिर गायब हो जाएंगे’। सरपंच की आवाज़ ऊपर तक जाती है, लेकिन जवाब में बस कागज़ी प्रक्रिया और टालमटोल मिलती है।
