वरिष्ठ खेल पत्रकार जसवंत क्लॉडियस का बड़ा सवाल—विश्वकप में भारतीय हॉकी को आलोचना नहीं, हौसले की जरूरत! दिग्गजों की टिप्पणियों के बीच टीम के भविष्य पर रखी बेबाक राय

पुरुष विश्वकप हाकी प्रतियोगिता 2026: हौसला बढ़ाने की जरूरत

भारतीय हॉकी टीम लौटेगी बेहतर वरीयता के साथ

आलेख.. जसवंत क्लॉडियस, वरिष्ठ स्वतंत्र खेल पत्रकार, टीवी कमेंटेटर, रायपुर. (छ ग)

रायपुर : बहुत से पाठक यकीन नहीं करेंगे लेकिन यह सत्य है कि जिस तरह आज शहर, कस्बा हो या गांव के मैदान, यहां तक सूखे खेतों में अधिकांश भारत को क्रिकेट खेलते हुए देखा जा रहा है, ठीक उसी तरह एक समय भारत में किसी भी खाली मैदान पर नजर डालने से सभी आयु वर्ग के लोग फुटबाल,व्हालीबाल, हाकी या फिर परंपरागत खेल जैसे पिट्‌ठूल, बांटी ,भौंरा, बिल्लस, चौरस, मलखंभ आदि खेलते हुए नजर आया करते थे। 1928 से 1956 तक लगातार छह बार आधुनिक ग्रीष्मकालीन ओलंपिक खेलों में हाकी का स्वर्ण पदक भारत ने जीता था। फिर 1964,1980 में यही करिश्मा दोहराया। 1960 में रजत और 1968,1972,2020,2024 में चार बार कांस्य पदक जीता। भारत को हाकी में पहली बार ओलंपिक 1976 में कोई पदक नहीं मिला। एशियाई खेलों में 1966,1998,2014,2022 में भारत ने चार बार स्वर्ण पदक जीता।

कुल मिलाकर भारतीय खेल इतिहास में हाकी विश्व स्तरीय पहचान बनाने में सफल हुआ था। विश्वकप हाकी की शुरूवात 1971 से हुई जिसमें 1971,1973,1975 में भारत ने क्रमश: कांस्य, रजत व स्वर्ण पदक पर कब्जा जमाया। भारत के रायपुर शहर में 2014-15 में संपन्न वर्ल्ड हाकी लीग स्पर्धा में भारत ने कांस्य पदक जीता था। वस्तुत: 1971 के पश्चात से विश्व हाकी फेडरेशन में एशियाई देशों का प्रतिनिधित्व कम होता चला गया और यूरोप व अन्य महाद्वीपों के चुने हुए प्रतिनिधियों ने हाकी खेल के नियम में लगातार परिवर्तन किए इससे हाकी तेज तो हो गया लेकिन एशियाई शैली जैसे जैसे छोटे-छोटे पास, ड्रिब्लिंग, ऑफ साइड आदि के नियम बदलते चले गये। स्थिति इतनी बदली कि 1976 में हाकी को घास वाली मैदान में खेलना अनिवार्य कर दिया।

इसी वजह से 1976 के ओलंपिक खेलों में कृत्रिम घास के मैदान पर हाकी खेला गया तो हमारे खिलाड़ी चारों खाने चित्त हो गये और भारत के हाथ से 1928 के बाद पहली बार पदक फिसल गया। धीरे-धीरे भारत में कृत्रिम घास का मैदान बनने लगा। फिर गाड़ी पटरी पर आई और 2014 के बाद हाकी में भारत ने अपनी पुरानी ख्याति प्राप्त करना शुरू किया। 2014 में एशियाई खेलों का स्वर्ण पदक,2015 में वर्ल्ड हाकी लीग में कांस्य, 2020, 2024 में दो लगातार ओलंपिक खेलों में कांस्य पदक जीतकर भारत एक दमदार टीम के रूप में उभरा है। 2026 में विश्वकप में उतरने पहले भारतीय पुरुष टीम को नौवी वरीयता प्राप्त थी, उस दृष्टि से 2026 में वह बेल्जियम के विरूद्ध 28 अगस्त को सातवे या आठवें स्थान के लिए मैच खेलेगी।

अभी अंतिम परिणाम आना बाकी लेकिन ठीक उसके पहले हमारे देश के अपने जमाने के दिग्गज खिलाड़ी जगबीर सिंह, पी.आर. श्रीनेत्र, वासुदेवन भास्करन, परगट सिंह आदि ने भारतीय टीम के 2026 विश्वकप में प्रदर्शन पर सवाल उठाए हैं तथा कमजोरियों की ओर अवगत कराया है। फिलहाल भारतीय टीम ने जो प्रदर्शन किया है यह निश्चित है कि उन्होंने अपनी प्रतिष्ठा के अनुकूल प्रदर्शन किया है बल्कि उससे भी बेहतर क्योंकि भारत की विश्व रेकिंग अब वर्तमान 9 से ऊपर ही जायेगी। फिर इतना हो हल्ला क्यों? अगर कोई टीका टिप्पणी करना ही है वे उसे सार्वजनिक रूप से मीडिया के माध्यम से न करके अपने सुझाव हाकी इंडिया को भी सकते थे. संभव है अपने आपको शायद वर्तमान चयनकर्ताओं से अच्छा या वर्तमान कोच, सहयोगी सदस्यों से अच्छा साबित करने के फेर में उभरते हुए हाकी खिलाड़ियों को,हॉकी प्रेमियों को निराशा में डुबाने का प्रयास कर रहे हैं।

भास्करन ने 1980 में भारत के लिए मास्को ओलंपिक में स्वर्ण पदक जीता था जब ओलंपिक खेलों में बहिष्कार की छाया थी। किसी प्रतिष्ठित टीम ने इसमें भाग नहीं लिया था .जगबीर सिंह 1985 से 1996 तक भारतीय टीम के सदस्य थे विश्वकप, ओलंपिक खेलों में कुछ भी नहीं कर सके सिवाय 1986,1990 के एशियाई खेलों में क्रमश: कांस्य व रजत पदक जीतने के अलावा.जगबीर अभी बड़ी बड़ी बातें कर रहे हैं परंतु जब वे भारतीय टीम के कोच थे तब 2004 एथेंस ओलंपिक में भारतीय टीम सातवें स्थान पर थी। इसी तरह परगट सिंह 1992-1996 ओलंपिक खेलों में भारतीय हाकी टीम के लगातार दो बार कप्तान थे तब भारत क्रमश: 8 वें व 7 वें स्थान पर आया।

इसी तरह श्रीजेश ने भारत को दो कांस्य पदक ओलंपिक में, दो स्वर्ण एशियाड 2014,2022 में दिलाये। अत: भारत के पूर्व खिलाड़ियों को प्रतिक्रिया देते समय देखना चाहिए उन्होंने अपने जमाने में भारत को क्या दिया? फिलहाल भारतीय हाकी टीम बदलाव के दौर से गुजर रही है परिणाम भविष्य में सुखद व सकारात्मक ही आयेगा।हमारे खिलाड़ी भारत का नाम रोशन करने के लिए कोचिंग कैंप में पसीना बहा रहे हैं। अपनी जवानी को दाव पर लगा दिया है। थोड़ा सब्र कीजिए परिणाम बेहतर होंगे।

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