अंतरजातीय विवाह पुनर्स्थापन के लिए महत्वपूर्ण कार्य करता महिला आयोग, आयोग की समझाईश पर अनावेदक और आवेदिका के बीच कराई जा रही सुलह के माध्यम से निराकरण की हो रही कार्यवाही

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समाज में पुनर्स्थापित कराकर प्रकरण किये जा रहे निराकृत

समदर्शी न्यूज़ ब्यूरो, दुर्ग

आज महिला आयोग द्वारा की गई जनसुनवाई में अंतरजातीय विवाह से संबंधित एक प्रकरण ने अपनी दस्तक दी। प्रकरण में आवेदिक का कथन था कि 2010 में उसके द्वारा अंतरजातीय विवाह किया गया था। जिसके लिए गांव द्वारा उसे व उसके परिवार को समाज से बहिष्कृत किया गया। वर्तमान में आवेदिक की 10 वर्ष की बच्ची भी है और वो अपने आप को समाजिक तौर पर निराधार पा रही है। इसलिए उसने महिला आयोग के समक्ष निराकरण के लिए अपना आवेदन लगाया है। इसी प्रकरण में अनावेदक गण से महिला आयोग द्वारा पूछताछ की गई उनके द्वारा स्वीकार किया गया कि गांव व समाज के लोगों ने मिलकर आवेदिका, उसके परिवार व उसके ससुराल वालों को समाज से बहिष्कृत किया है। प्रकरण में आगे प्रकाश डालते हुए आवेदिका ने बताया कि उसके ससुर से 7,000 रूपए व 1100 रूपए समाज के सहयोग के नाम पर ली गई है और शादी के 05 वर्षों के बाद समाज में मिलाने के लिए 50 हजार व 1 लाख की मांग समाज के द्वारा की जा रही है।

आयोग के द्वारा समझाईश दिए जाने पर अनावेदकगणो ने यह स्वीकार किया गया है कि आवेदिका और उसके परिवार को मिलाने की प्रक्रिया गांव एवं समाज द्वारा की जाएगी। इस अवसर पर आयोग की ओर से अधिवक्ता श्रीमती तुलसी साहू जी के साथ श्रीमती रामकली यादव, श्रीमती रत्ना नारमदेव व श्रीमती नीलू ठाकुर ग्राम बोडेगाव थाना नंदनी में उपस्थित रहेगें। इस सभा में आवेदिका को अपने पति व बच्चे के साथ उपस्थित होने के निर्देश भी दिए गए हैं। अनावेदकगण भी अपने गांव व समाज के सभी लोगों को इस बैठक में उपस्थित रखेंगे और गांव समाज के बीच में आवेदिका एवं उसके परिवार को सामजिक बहिष्कार को वापस लेने की घोषणा करेंगे। साथ ही साथ आवेदिका पक्ष से ली गई सहयोग राशि 7000/- रुपये व 1100/- रुपये भी वापस किया जाएगा। इस संपूर्ण प्रक्रिया के दौरान नंदनी थाना के थाना प्रभारी के माध्यम से किसी एसआई या हवलदार को उपस्थित रखने के भी निर्देश आयोग ने दिए है। यदि अनावेदकगण आयोग के निर्णय का उल्लंघन करते है तो अनावेदकगणों के विरुद्ध धारा 384 आईसीपीसी और नागरिक संरक्षण अधिनियम 1905 के अंतर्गत तत्काल एफआईआर दर्ज किये जाने के भी निर्देश दिए हैं साथ ही आयोग को सूचित करने कहा गया। जिससे आयोग द्वारा गठित सदस्यों के रिपोर्ट के आधार पर इस प्रकरण का निराकरण किया जा सकेगा।

एक अन्य प्रकरण में आवेदिका ने बताया कि उसके बच्चों को अनावेदकगण द्वारा परेशान किया जा रहा है। पति की मृत्यु के बाद आवेदिका अपने पति की पैतृक संपत्ति वाले मकान के एक हिस्से में निवास करती है। यहां अनावेदक द्वारा आवेदिका को यह कहकर परेशान किया जा रहा है कि उसका विवाह असैंवधानिक है और बच्चा भी मृतक पति से नहीं है। ऐसा कहकर उसे घर की सपंत्ति से बेदखल करने अलग-अलग तरीके से परेशान किया जा रहा है। आयोग में सुनवाई के दौरान भी अनावेदक ने कहा है कि आवेदक न ही उनके भाई के पत्नि है न ही बच्चा। आयोग की समझाईश पर अनावेदक और आवेदिका के बीच सुलह कराई गई और अनावेदक को निर्देशित किया गया कि आवेदिका को बिना किसी परेशानी के उसके हिस्से में रहने दिया जाएगा और अनावेदक उसके बाथरूम का इस्तेमाल नहीं करेगा। अनावेदक अपनी दैनिक दिनचर्या के लिए अपना अलग से बाथरूम बनवाएगा। किसी भी प्रकार की दखल अंदाजी के स्थिति में आवेदिका अनावेदक के विरुद्ध पुलिस थाना में एफआईआर दर्ज करा सकती है। इसी के साथ प्रकरण को नस्तीबद्ध किया गया।

एक और अन्य प्रकरण जिसमें आवेदिका पूर्व में ही अपने पति के नाम पर आवेदन कर चूंकि थी। इसके पश्चात पुनः आवेदिका द्वारा अपने पति व ससुर के अधिवक्ता के खिलाफ केस किया गया है। इस प्रकरण पर आवेदिका का कथन था कि न्यायालय के बाहर अधिवक्ता द्वारा उस पर दबाव बनाने का प्रयास किया जा रहा है ताकि वो अपने पति व ससुर पर चल रहे प्रकरण से अपने आप को अलग कर ले। परंतु आयोग द्वारा पाया गया कि आवेदिका के पास थाने या अधिवक्ता संघ में कोई भी लिखित दस्तावेज नहीं है। इसलिए प्रकरण को नस्तीबद्ध किया गया है। आज की सुनवाई में अधिवक्ता श्रीमती तुलसी साहू, श्रीमती रामकली यादव, श्रीमती नीलू ठाकुर, एल्डरमैन रत्ना नारमदेव सहित जिला प्रशासन, पुलिस प्रशासन उपस्थित रहे।

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