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  • सिकलसेल और एनीमिया उन्मूलन कार्यक्रम : खून की कमी महसूस होने पर सिकलसेल की जांच कराएं – सीएमएचओ डॉ एफ आर निराला

    सिकलसेल और एनीमिया उन्मूलन कार्यक्रम : खून की कमी महसूस होने पर सिकलसेल की जांच कराएं – सीएमएचओ डॉ एफ आर निराला

    समदर्शी न्यूज़ ब्यूरो, सारंगढ़-बिलाईगढ़

    कलेक्टर डॉ फरिहा आलम सिद्दीकी के निर्देशन में सीएमएचओ डॉ एफ आर निराला द्वारा सिकलसेल और एनीमिया जांच को जिले में अभियान के रूप में चलाया जा रहा है। डॉ निराला ने जिले के सभी नागरिकों को कहा है कि खून की कमी महसूस होने पर सिकलसेल की जांच कराएं। जिले में सिकलसेल एनीमिया उन्मूलन कार्यक्रम की स्थिति हमारे प्रदेश के साथ जिले में भी सिकलसेल एनीमिया से ग्रसित मरीजों की संख्या है। यह एक जेनेटिक डिसऑर्डर है। आम तौर पर इसका प्रभाव दर 6 से 10 प्रतिशत होता है। लोग सिकल सेल की एएस याने वाहक (कैरियर) के रूप में मिलते है, जबकि बीमारी के रूप में 0.5 से 1 प्रतिशत लोग है। छत्तीसगढ के कई जाति में इसका प्रभाव ज्यादा है।

    सामान्यतः खून  के आरबीसी की रंग लाल होती है, जो हीमोब्लोबिन के कारण होता है। जितना ज्यादा हीमोग्लोबिन होता है उतना ज्यादा रक्त लाल रंग हीमोग्लोबिन ही है, जो रक्त से ऑक्सीजन को ग्रहण करता है और कोशिकाओं तक पहुंचता है। आरबीसी की आकृति सामान्यतः सेव फल के आकृति का होता है। इसी कारण ऑक्सीजन छोटी – छोटी ब्लड वेसल्स के माध्यम से शरीर के विभिन्न अंगों तक आसानी से पहुंचती है, लेकिन सिकलसेल की बीमारी में इसी आरबीसी की आकृति जो सेव फल जैसी होती है, बदलाव हो जाता है और यह सिकल याने हंसिए की आकृति की हो जाती है  जिससे आरबीसी की रक्त वाहिनियों में संचरण प्रभावित होता है।

    हंसिए के आकार होने के कारण आरबीसी संचरण नही हो पाता। परिणाम कोशिकाओं तक ऑक्सीजन कम पहुंचता है, जिस जगह पर दर्द होता है। उस जगह पर रक्त वाहिनियों में आरबीसी उलझ जाता है। ऐसे व्यक्तियों में जो सामान्य समस्या होती है दर्द होना,थकावट होना, चक्कर आना, सांस फूलना, कमजोरी महसूस करना, शरीर पीला दिखना होता है। सामान्यतः आरबीसी बनता है। लगभग 4 माह जिंदा रहता है, लेकिन सिकलसेल हो जाने पर आरबीसी की आयु कम हो जाता है। यही कारण है सिकलसेल एनीमिया के मरीज को बार बार ब्लड ट्रांसफ्यूजन की जरूरत पड़ती है। सिकलसेल के मरीज जो एक जेनेटिक डिसऑर्डर है। पीढ़ी दर पीढ़ी  ट्रांसफर होता है।

    आइए देखते है कैसे ट्रांसफर होता है, जिनके माध्यम से सिकलसेल इसकी 5 अवस्थाएं है। समझने के लिए मान लीजिए पति पत्नी दोनो की रक्त में आरबीसी सामान्य है याने एए और एए है। इनके होने वाले 4 संतान में चारो सामान्य होंगे। इनको सिक्लिंग नही है। दूसरी अवस्था में मान लीजिए पति पत्नी में से कोई एक एएस याने वाहक (कैरियर) होंगे। उस अवस्था में इनके होने वाले 4 संतानों में 2 सामान्य होंगे और दो संतान कैरियर होंगे। तीसरी अवस्था में मान लीजिए पति पत्नी दोनो वाहक (कैरियर) होंगे। उस अवस्था में 4 संतान में, एक संतान नार्मल होंगे, 2 संतान कैरियर होंगे और एक संतान एसएस याने डिजीज होंगे। चौथी अवस्था होती है। मान ले पति पत्नी में एक एएस याने वाहक (कैरियर) है जबकि दूसरा एसएस याने डिजीज है। उस स्थिति में 4 संतान में से 2 कैरियर और 2 डिजीज होंगे।

    पांचवी अवस्था होती है जब पति पत्नी दोनो एसएस याने डिजीज होंगे। उस स्थिति में उनके होने वाले 4 संतान में चारो डिजीज याने एसएस होंगे। इसे ठीक करने हो तो शादियां कैरियर या डिजीज से करने के बजाय नार्मल से करने पर इसके संतान सिकल सेल से बचेंगे। एसएस के मरीजों को समय समय पर आरएफटी, एलएफटी, सीबीसी की जांच कराते रहना चाहिए। जब हीमोग्लोबिन अत्यधिक कम हो जाती है तब ब्लड ट्रांसफ्यूजन की जरूरत पड़ती है। सिकल सेल की मरीजों को दी जाने वाले दवाइयां, सभी सरकारी स्वास्थ्य संस्था उपलब्ध है।

    सिकलसेल एनीमिया उन्मूलन कार्यक्रम के अंतर्गत जन्म से 40 वर्ष के सभी नागरिकों को खून की जांच कर सिकलिंग की पता लगाने की जरूरत है। इसकी पूरी तैयारी शासन स्तर पर है। सभी हेल्थ एंड वेलनेस सेंटर,सभी प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र ,सभी सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र के साथ साथ हाट बाजार क्लिनिक और मुख्यमंत्री मेडिकल यूनिट वाले बस (एमएमयू) में भी जांच की व्यवस्था की जा चुकी है। इसके लिए शासन स्तर से बकायदा सभी लक्ष्य दिया गया है। जांच करने के लिए जिसमें उप स्वास्थ्य केंद्र (एसएचसी) को 5 टेस्ट प्रति कार्य दिवस, सभी हेल्थ एंड वेलनेस सेंटर (एचडब्ल्यूसी) और प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र (पीएचसी) को 10 टेस्ट प्रति कार्य दिवस, सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र (सीएचसी) को 30 टेस्ट प्रति कार्य दिवस। इसी तरह से जिला अस्पताल को 60 टेस्ट प्रति कार्य दिवस किया जाना है।

    हाट बाजार टीम को 5 टेस्ट प्रति बाजार, साथ में एमएमयू को भी 25 टेस्ट सिकलसेल की जांच प्रति कार्य दिवस किया जाना है। हमारे जिले की इस वित्तीय वर्ष के लिए 1, 04,768 जांच किए जाने का लक्ष्य मिला हुआ है। अब तक 60,288 की जांच हो चुकी है। जन्म से 40 वर्ष के सभी नागरिकों की जांच जिले के सभी स्वास्थ्य संस्थाओं में जांच की जाएगी। इन जगहों पर पहले सोलुबिलिटी टेस्ट होगी। बाद में  इसकी कंफरमेटी टेस्ट होगी, जिसे इलेक्ट्रोफोरेसिस कहते है, की जावेगी। आज कल एक नई विधि है जिसे पीओसी कहते है। इससे भी कन्फर्म करते है।

    टेस्ट करते समय सभी का फोटो भी लेना है। स्पेशली पॉजिटिव आने पर मरीज का फोटो लेना अनिवार्य है। यही नही बल्कि सभी टेस्ट की ऐप में इंट्री भी करना है। पॉजिटिव मरीजों को कार्ड भी बना कर देना है। इस कारण उसकी फोटो के अलावा अन्य जानकारी भी तुरंत एकत्रित किया जाना है। सभी बीएमओ को निर्देश है कि इसकी नियमित समीक्षा करे। डेली जांच की, डेली इंट्री की,पॉजिटिव मरीजों की फोटो सहित जानकारी,दवाई मिली की नही,अगर बल्ड ट्रांसफ्यूजन की आवश्यकता हो तो इसकी व्यवस्था हो इसके लिए भी बीच बीच में सभी सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र (सीएचसी) में  ब्लड डोनेशन कैंप भी लगाया जाए।

  • अम्बेडकर अस्पताल के हार्ट, चेस्ट और वैस्कुलर सर्जरी विभाग में 9 किलो वजनी 3 साल उम्र की मासूम के फेफड़े से निकला 1.5 किलोग्राम का ट्यूमर

    अम्बेडकर अस्पताल के हार्ट, चेस्ट और वैस्कुलर सर्जरी विभाग में 9 किलो वजनी 3 साल उम्र की मासूम के फेफड़े से निकला 1.5 किलोग्राम का ट्यूमर

    समदर्शी न्यूज़ ब्यूरो, रायपुर

    डॉ. भीमराव अम्बेडकर स्मृति चिकित्सालय रायपुर के हार्ट, चेस्ट और वैस्कुलर सर्जरी विभाग में 3 साल की बच्ची के छाती के अंदर हार्ट के पीछे स्थित एवं हार्ट से चिपके हुए 1.5 किलोग्राम के ट्यूमर (कैंसर) का सफल ऑपरेशन करके बच्ची को नई जिंदगी दी गई। मेडिकल भाषा में इस ट्यूमर को गैन्ग्लियो न्यूरो फाइब्रोमा ऑफ लेफ्ट हीमोथोरेक्स (ganglioneurofibroma of left hemothorax ) कहा जाता है। सामान्य भाषा में इसे पोस्टीरियर मेडिस्टाइनल ट्यूमर कहा जाता है।

    ऑपरेशन के पहले छाती का एमआरआई फिल्म जिसमें बायां फेफड़ा में बहुत बड़ा ट्यूमर दिख रहा है।

    रायगढ़ के टुडरी गांव में रहने वाले परिवार की बच्ची जन्म के बाद पूरी तरह सामान्य थी परंतु 2 साल की उम्र होते-होते उसके चलने की क्षमता समाप्त हो गई। बच्ची अपने पैरों पर खड़ी भी नहीं हो पा रही थी। तब उन्होंने उड़ीसा के बुरला मेडिकल कॉलेज में दिखाया परंतु वहां बीमारी का पता नहीं चला। उसके बाद वे रायपुर एम्स में दिखाये जहां पर बीमारी का पता चला। इसमें बच्ची के स्पाइनल कॉड (रीढ़ की हड्डी) में ट्यूमर था जिसके कारण बच्ची के पैरों की ताकत समाप्त हो गई थी। एम्स के न्यूरोसर्जन ने मासूम के स्पाइनल कॉर्ड से ट्यूमर निकाल दिया जिससे थोड़ा बहुत बच्ची चलने लगी परंतु कुछ ही समय बाद यह ट्यूमर पूरे बायीं छाती में फैल गया और यह ट्यूमर इतना बड़ा था जिससे बच्ची ठीक से सांस नहीं ले पा रही थी। एम्स के डॉक्टरों ने ट्यूमर के फैलाव को देखते हुए यह केस अम्बेडकर अस्पताल के हार्ट, चेस्ट और वैस्कुलर सर्जन डॉ. कृष्णकांत साहू के पास रिफर कर दिया। डॉ. साहू बताते हैं कि यह ट्यूमर इतना बड़ा था कि शरीर के मुख्य अंग जैसे महाधमनी, सबक्लेवियन आर्टरी ( left subclavian artery ), हार्ट की झिल्ली ( pericardium ) एवं लंग हाइलम् को चपेट ( invaded) में ले लिया था जिसके कारण इसको निकालना असंभव सा प्रतीत हो रहा था। डॉ. साहू बताते हैं कि उन्होंने फेफड़े एवं छाती के कैंसर के 250 से भी ज्यादा केस ऑपरेट कर चुके हैं एवं पोस्टेरियर मेडिस्टाइनल ट्यूमर के 25 से भी ज्यादा ऑपरेशन कर चुके हैं परंतु अभी तक 3 साल की बच्ची में इतना बड़ा पोस्टेरियर मेडिस्टाइनल ट्यूमर का केस पहली बार देखा। पहले तो ऑपरेशन के लिए मना कर दिया कि यह केस ऑपरेशन के लायक नहीं है क्योंकि इसमें बच्चे के जान जाने की 90 से 95 प्रतिशत संभावना है और ऑपरेशन नहीं भी करवाते तो कैंसर बीमारी के कारण 100 प्रतिशत जान जाने की संभावना है। फिर भी 5 प्रतिशत सफलता की आशा के साथ बच्ची के माता-पिता ऑपरेशन के लिए राजी हो गए।

    ऑपरेशन के बाद ट्यूमर निकल जाने बाद का छाती का एक्सरे जिसमे बायां फेफड़ा बिल्कुल सामान्य सा दिखाई दे रहा है।

    इस ऑपरेशन को पहले एसीआई के हार्ट, चेस्ट और वैस्कुलर सर्जरी विभाग में करने के लिए प्लान किया गया था परंतु ट्यूमर के बहुत बड़े होने एवं मासूम की उम्र बहुत ही कम होने तथा हाई रिस्क केस होने के कारण यहाँ के एनेस्थीसिया विशेषज्ञों ने डीकेएस हॉस्पिटल के पीडियाट्रिक सर्जरी विभाग के ऑपरेशन थियेटर में ऑपरेशन की सलाह दी। डी. के. एस. सुपरस्पेशालिटी हॉस्पिटल के पीडियाट्रिक सर्जरी की एचओडी डॉ. शिप्रा शर्मा एवं डॉ. नितिन शर्मा से बात करके बच्चे को डीकेएस शिफ्ट कराया गया।

     ऐसे हुआ ऑपरेशन

    बच्ची के छाती के महत्वपूर्ण अंगों को बचाते हुए लगभग 1.5 किलोग्राम का ट्यूमर पूर्णतः  (R 0 Resection) निकाल दिया गया। यह ट्यूमर इतना बड़ा था कि इसको टुकड़ों में निकालना पड़ा। जिस स्पाइनल कार्ड से ट्यूमर की उत्पत्ति हुई थी वहां भी बारीकी से  ट्यूमर के हर हिस्से को निकाला गया। स्पाइनल कॉर्ड को बचाते हुए ड्यूरा मेटर ( dura mater ) को भी रिपेयर किया गया जिससे स्पाइल फ्लुइड ( cerebrospinal fluid (CSF)  ) लीकेज नहीं हो सके।

    मरीज को चार दिनों तक वेंटीलेटर में रखना पड़ा। ऑपरेशन के बाद लगभग 10 दिनों तक बच्ची की हालत नाजुक थी। डॉ. कृष्णकांत साहू ने डी. के. एस. सुपरस्पेशालिटी हॉस्पिटल के पीडियाट्रिक सर्जरी एचओडी डॉ. शिप्रा शर्मा, एसोसिएट प्रो. डॉ. नितिन शर्मा एवं एनेस्थीसिया विभाग के कंसल्टेंट, रेजिडेंट एवं नर्सिंग स्टाफ का आभार व्यक्त करते हुए कहा कि यह ऑपरेशन टीम वर्क के कारण ही सफल एवं संभव हो पाया। बिना पोस्ट ऑपरेटिव केयर यानी गहन देखभाल के बिना कोई भी ऑपरेशन सफल नहीं होता है इसलिए पोस्ट ऑपरेटिव केयर करने वाले सभी स्टाफ को धन्यवाद देता हूं। बच्ची को 18 दिनों बाद अस्पताल से डिस्चार्ज दे दिया गया एवं बच्ची अपने प्रथम फ़ॉलो अप में बिल्कुल स्वस्थ है। बच्ची का चलना फिरना शुरू हो गया है। यह ऑपरेशन स्वास्थ्य सहायता योजना की मदद से पूर्णतः निशुल्क हुआ।

  • जशपुर : छात्रों का रक्त समूह एवं सिकल सेल की जांच की गई

    जशपुर : छात्रों का रक्त समूह एवं सिकल सेल की जांच की गई

    समदर्शी न्यूज़ ब्यूरो, जशपुर

    सहायक आयुक्त आदिवासी विकास जशपुर के मार्गदर्शन में एव सीएमएचओ के सहयोग से मेडिकल टीम द्वारा शासकीय आदर्श छात्रावास जशपुर, शासकीय प्रयास विद्यालय जशपुर के 403 छात्रों का रक्त समूह एवं सिकल सेल की जांच की गई। जिसमें सिकल सेल से प्रभावित कोई भी छात्र नहीं पाए गए।

  • मानसिक परेशानी कई तरह से मानव विकास पर असर डालती है – आर. श्रीनिवास मूर्ति

    मानसिक परेशानी कई तरह से मानव विकास पर असर डालती है – आर. श्रीनिवास मूर्ति

    समदर्शी न्यूज़ ब्यूरो, रायपुर

    पंडित जवाहर लाल नेहरू स्मृति चिकित्सा महाविद्यालय के मनोरोग विभाग एवं इंडियन एसोसिएशन फॉर सोशल साइकिएट्री के संयुक्त तत्वावधान में 30 वें वार्षिक राष्ट्रीय सम्मेलन एनसीआईएएसपी 2023 (नेशनल कॉन्फ्रेंस ऑफ इंडियन एसोसिएशन फॉर सोशल साइकिएट्री) का आयोजन चिकित्सा महाविद्यालय के अटल बिहारी वाजपेयी सभागार (ऑडिटोरियम) में किया जा रहा है। 24 नवंबर से प्रारंभ होकर 26 नवंबर तक चलने वाले इस तीन दिवसीय सम्मेलन में सामाजिक मनोचिकित्सा (सोशल साइकिएट्री) के विविध पहलुओं पर मंथन करने के लिए देश के विभिन्न हिस्सों से विशेषज्ञ शामिल हुए हैं। ”मानसिक स्वास्थ्य में लोक स्वास्थ्य दृष्टिकोण (पब्लिक हेल्थ एप्रोचेस इन मेंटल हेल्थ)“ विषय पर पूरा सम्मेलन केन्द्रित है। शुक्रवार को इस सम्मेलन का विधिवत शुभारंभ पं. दीनदयाल उपाध्याय स्मृति स्वास्थ्य विज्ञान एवं आयुष विश्वविद्यालय के कुलपति (वाइस चांसलर) डॉ. ए. के. चंद्राकर एवं पंडित जवाहर लाल नेहरू स्मृति चिकित्सा महाविद्यालय की अधिष्ठाता (डीन) डॉ. तृप्ति नागरिया के मुख्य आतिथ्य में संपन्न हुआ।

    चिकित्सा महाविद्यालय में मनोरोग विभाग के विभागाध्यक्ष एवं आयोजन समिति के अध्यक्ष डॉ. मनोज कुमार साहू ने बताया कि यह सम्मेलन वर्तमान परिदृश्य को देखते हुए वैज्ञानिक दृष्टिकोण के साथ सामाजिक मनोविज्ञान को संदर्भित करते हुए मानसिक स्वास्थ्य को बढ़ावा देने, भविष्य की मानसिक स्वास्थ्य समस्याओं को रोकने और मानसिक स्वास्थ्य समस्याओं से उबरने पर केन्द्रित है।

    मनोरोग विभाग की एसोसिएट प्रोफेसर डॉ. सुरभि दुबे ने बताया कि मानसिक स्वास्थ्य (मेंटल हेल्थ) एक समाज, परिवार और व्यक्ति सभी की जिम्मेदारी है। जब सभी वर्ग साथ मिलकर काम करेंगे तो दिमाग और मन दोनों स्वस्थ रहेगा। किसी भी मानसिक रोग का निदान समग्र प्रयास (होलिस्टिक एप्रोच) से ही संभव है जिसमें दवाईयों के साथ-साथ समाज का योगदान, समाज का दृष्टिकोण, मानसिक रोग के प्रति और रोगी के साथ लोगों का अच्छा व्यवहार करना शामिल है। 

    सम्मेलन के वैज्ञानिक सत्र में आयोजित कार्यशाला में डॉ. नितिन गुप्ता ने भारतीय परिदृश्य में मनोचिकित्साः व्यक्तिगत गतिशील मनोचिकित्सा के मूल्यांकन और संचालन की प्रक्रिया पर व्याख्यान दिया। उन्होंने बताया कि मनोचिकित्सा विभिन्न प्रकार के उपचारों को संदर्भित करता है। मनोचिकित्सा की मदद से मानसिक स्वास्थ्य समस्या जैसे – अवसाद, चिंता, भय, मादक द्रव्यों के सेवन से पीड़ित लोगों को अपनी समस्याओं से उबरने में मदद मिलती है।

    मानसिक स्वास्थ्य में सार्वजनिक स्वास्थ्य दृष्टिकोणः अवलोकन और प्रासंगिकता, मानसिक स्वास्थ्य के सामाजिक निर्धारक-वर्तमान स्थिति और साक्ष्य, सार्वजनिक स्वास्थ्य और मनोचिकित्सा में अनुसंधान के लिए दायरा और प्रशिक्षण, सार्वजनिक स्वास्थ्य विशेषज्ञ से मानसिक स्वास्थ्य – परिप्रेक्ष्य में सार्वजनिक स्वास्थ्य दृष्टिकोण जैसे विषयों पर आयोजित संगोष्ठी को राकेश के. चड्ढा, रॉय अब्राहम कल्लीवायलिल एवं इंदु पीएस ने संबोधित किया।

    निम्हांस बैंगलोर से आये विशेषज्ञ आर. श्रीनिवास मूर्ति ने मानसिक स्वास्थ्य, कल्याण और मानव विकास विषय पर व्याख्यान देते हुए बताया कि मानसिक परेशानी कई तरह से मानव विकास पर असर डालती है इसलिए आवश्यक है कि मानसिक स्वास्थ्य को फोकस के रूप में पहचानें। देखभाल केंद्रों को मानसिक स्वास्थ्य केन्द्रों में बदलकर, सभी व्यावसायिक प्रशिक्षणों में मानसिक स्वास्थ्य को शामिल करके, विशेष रूप से बीमार व्यक्तियों और उनकी देखभाल करने वालों के बीच भावनात्मक स्वास्थ्य के लिए स्व-देखभाल (सेल्फ-केयर) का प्रसार करके तथा शिक्षा, श्रम विकास, मीडिया एवं अन्य संगठनों के सहयोग से मानसिक स्वास्थ्य की दिशा में बेहतर कार्य किये जा सकते हैं।

    सम्मेलन में इंडियन एसोसिएशन फॉर सोशल साइकिएट्री के पदाधिकारी डॉ. उत्तम सी. गर्ग, डॉ. वर्गीज पी. पुन्नोस, प्रो. देबाशीष बसु, प्रो. ममता सूद, डॉ. नितिन गुप्ता, डॉ. जी. एस. कलोरिया शामिल हुए हैं। सम्मेलन के आयोजन समिति के अध्यक्ष चिकित्सा महाविद्यालय के मनोरोग विभाग के विभागाध्यक्ष डॉ. मनोज कुमार साहू, आयोजन सचिव डॉ. दीपक घोरमोड़े एवं कोषाध्यक्ष डॉ. सुरभि दुबे हैं।

  • तंबाकू पर स्वास्थ्य कर बढ़ाएं, खरीदना महंगा करें (सामर्थ्य से दूर करें) और राजस्व बढ़ाएं – डॉक्टरों, अर्थशास्त्रियों, जन स्वास्थ्य समूहों ने सरकार से किया आग्रह

    तंबाकू पर स्वास्थ्य कर बढ़ाएं, खरीदना महंगा करें (सामर्थ्य से दूर करें) और राजस्व बढ़ाएं – डॉक्टरों, अर्थशास्त्रियों, जन स्वास्थ्य समूहों ने सरकार से किया आग्रह

    समदर्शी न्यूज़ ब्यूरो, रायपुर

    डॉक्टरों और अर्थशास्त्रियों के साथ जन स्वास्थ्य समूहों ने सरकार से अपील की है कि 2024-25 के केंद्रीय बजट में सभी तंबाकू उत्पादों पर उत्पाद शुल्क बढ़ाया जाये ताकि अतिरिक्त राजस्व प्राप्त हो सके। वित्त मंत्रालय से की गई अपनी अपील में इन सबों ने सिगरेट, बीड़ी और बगैर धुंए वाले तंबाकू पर स्वास्थ्य कर बढ़ाने का आग्रह किया है। उत्पाद शुल्क स्वास्थ्य कर है जो तंबाकू जैसे उन उत्पादों पर लगता है जिनका जन स्वास्थ्य पर स्पष्ट नकारात्मक प्रभाव पड़ता है। इन विशेषज्ञों के अनुसार, तम्बाकू की खपत को विनियमित करने के लिए कई सार्वजनिक नीति उपकरणों में से उत्पाद कर को बढ़ाना सबसे अधिक किफायती माना जाता है। यह दुनिया भर में हुए शोध के एक बड़े समूह पर आधारित है। हेल्थ यानी स्वास्थ्य कर को सिन (पाप) टैक्स के रूप में भी जाना जाता है। अक्सर इसे प्राप्त करने के लिए कई देशों में इसका उपयोग किया जाता है।

    एक हालिया अध्ययन के अनुसार, पिछले 10 वर्षों में सिगरेट, बीड़ी और बगैर धुंए वाले तंबाकू जैसे उत्पाद लगातार सस्ते हुए हैं। हाल ही में, सिगरेट पर एनसीसीडी में मामूली वृद्धि हुई है, लेकिन इसके अलावा जुलाई 2017 में जीएसटी की शुरुआत के बाद से तंबाकू करों में कोई बड़ी वृद्धि नहीं हुई है। वर्तमान जीएसटी दर, मुआवजा उपकर, एनसीसीडी और केंद्रीय उत्पाद शुल्क को जोड़कर कुल कर बोझ (अंतिम कर सहित खुदरा मूल्य के प्रतिशत के रूप में कर) सिगरेट के लिए केवल 49.3%, बीड़ी के लिए 22% और धुआं रहित तंबाकू के लिए 63% है। विश्व स्वास्थ्य संगठन सभी तंबाकू उत्पादों पर खुदरा मूल्य का कम से कम 75% कर बोझ डालने की सिफारिश करता है। लेकिन सभी तंबाकू उत्पादों पर कर का मौजूदा बोझ इससे काफी कम है।

    राजगिरी कॉलेज ऑफ सोशल साइंसेज, कोच्चि में स्वास्थ्य अर्थशास्त्री और सहायक प्रोफेसर डॉ. रिजो जॉन ने कहा, “इस तथ्य के मद्देनजर कि जीएसटी को लागू हुए छह साल से अधिक समय हो चुका है और इस अवधि में तंबाकू उत्पादों पर कोई बड़ी कर वृद्धि नहीं हुई है, केंद्र सरकार के लिए यह महत्वपूर्ण है वह तंबाकू पर टैक्स बढ़ाने के बारे में विचार करे और यह राष्ट्रीय आपदा आकस्मिक शुल्क (एनसीसीडी) में मामूली वृद्धि से अलग हो जो तंबाकू पर लगाए गए कुल करों का 10% से भी कम है। जब सरकार तंबाकू पर कर बढ़ाने से बचती है, तो तंबाकू कंपनियां स्वतंत्र रूप से कीमतें बढ़ा देती हैं, जिससे उनका मुनाफा बढ़ जाता है। नतीजतन, सरकार जो संवर्धित राजस्व एकत्र कर सकती थी, उसे उद्योग के मुनाफे की ओर मोड़ या घुमा दिया जाता है।”

    विशेषज्ञों के अनुसार, केंद्र सरकार द्वारा सभी तंबाकू उत्पादों पर उत्पाद शुल्क बढ़ाना केंद्र सरकार द्वारा राजस्व बढ़ाने की तात्कालिक आवश्यकता को पूरा करने के लिए एक बहुत प्रभावी नीतिगत उपाय हो सकता है। यह राजस्व प्राप्त करने और तंबाकू के उपयोग तथा संबंधित बीमारियों को कम करने के लिए एक सफल उपाय होगा।

    टाटा मेमोरियल हॉस्पिटल में हेड नेक कैंसर सर्जन, डॉ. पंकज चतुर्वेदी ने कहा, तम्बाकू का उपयोग, धीमी गति से बढ़ने वाली महामारी है। हर साल यह खुद 13 लाख भारतीयों की जान लेता है। तम्बाकू उत्पादों को युवाओं और समाज के वंचित वर्गों जैसी कमजोर आबादी के हाथों से दूर रखना पहले से कहीं अधिक महत्वपूर्ण है। भारत में लगभग 50 प्रतिशत कैंसर तम्बाकू के कारण होते हैं। सभी तंबाकू उत्पादों पर कर बढ़ाना देश के साथ-साथ उपयोगकर्ताओं के भी हित में है। इससे उनकी सामर्थ्य और खपत कम हो जाएगी।

    स्वास्थ्य पर संसद की स्थायी समिति ने हाल ही में कैंसर देखभाल योजना और प्रबंधन पर एक प्रासंगिक और व्यापक रिपोर्ट प्रस्तुत की है जिसमें उसने भारत में कैंसर के कारणों का विस्तृत अध्ययन किया है और चिंता के साथ दर्ज किया है कि भारत में, “तम्बाकू के कारण होने वाले मुँह के कैंसर के कारण सबसे अधिक संख्या में लोगों की जान जाती है। इसके बाद फेफड़ों, ग्रासनली और पेट का कैंसर आता है।” इसमें यह भी कहा गया है कि तम्बाकू का उपयोग कैंसर से जुड़े सबसे प्रमुख जोखिम कारकों में से एक है। इन चिंताजनक टिप्पणियों के मद्देनजर, समिति ने कहा है कि भारत में तंबाकू उत्पादों की कीमतें सबसे कम हैं और तंबाकू उत्पादों पर कर बढ़ाने की जरूरत है। समिति तदनुसार सरकार को तम्बाकू पर कर बढ़ाने और प्राप्त अतिरिक्त राजस्व का उपयोग कैंसर की रोकथाम और जागरूकता के लिए करने की सिफारिश करती है।

    विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) के अनुसार, तंबाकू उत्पादों के खुदरा मूल्य में करों का हिस्सा कम से कम 75% होना चाहिए। दुनिया भर के 40 से अधिक देशों ने अपने खुदरा मूल्य के 75% से अधिक पर तंबाकू कर लगाया है। इनमें श्रीलंका (77%) और थाईलैंड (78.6%) शामिल हैं।

    भारत दुनिया में तम्बाकू उपयोगकर्ताओं की दूसरी सबसे बड़ी संख्या (268 मिलियन) है और इनमें से 13 लाख लोग हर साल तम्बाकू से संबंधित बीमारियों से मर जाते हैं। भारत में लगभग 27% कैंसर तम्बाकू के कारण होते हैं। तम्बाकू के उपयोग से होने वाली सभी बीमारियों और मौतों से वार्षिक आर्थिक लागत 2017-18 में 177,341 करोड़ रुपये होने का अनुमान है, जो भारत की जीडीपी का 1% है ।

  • जशपुर जिले में पुरूष नसबंदी पखवाड़ा 21 नवम्बर से 04 दिसम्बर तक आयोजित

    जशपुर जिले में पुरूष नसबंदी पखवाड़ा 21 नवम्बर से 04 दिसम्बर तक आयोजित

    समदर्शी न्यूज़ ब्यूरो, जशपुर

    जशपुरनगर: परिवार कल्याण कार्यक्रम अंतर्गत जिले में पुरुष नसबंदी पखवाड़ा के तहत् 21 से 27 नवम्बर तक स्वास्थ्य कार्यकर्ताओं द्वारा योग्य दम्पत्तियों से सम्पर्क कार्यक्रम तथा 28 नवम्बर से 04 दिसम्बर 2023 तक पुरूष नसबंदी सुविधा केन्द्र जिला अस्पताल जशपुर, सामुदायिक स्वास्थ्य केन्द्र कांसाबेल एवं पत्थलगांव में पखवाडा के दौरान एवं अन्य दिवसों में निःशुल्क उपलब्ध है। पुरूष नसबंदी पखवाड़ा के अवसर पर सीएमएचओ डॉ. रंजित टोप्पो ने मुख्य चिकित्सा एवं स्वास्थ्य अधिकारी कार्यालय से सामुदायिक स्वास्थ्य केन्द्र एवं ग्रामीण स्तर पर प्रचार के लिए जनजागरूकता रथ को हरी झंडी दिखाकर रवाना किया।

    पुरूष नसबंदी बिना चीरा एवं टांका के 10 से 20 मिनट में पूरी की जाती है। प्रक्रिया दर्दरहित रहता है हितग्राही उसी दिन घर जा सकता है नसबंदी के बाद पहले जैसा भारी काम कर सकते हैं। पखवाड़े के दौरान ऐसे दम्पत्ति जिन्हें और बच्चे नहीं चाहिये अपने नजदीकी स्वास्थ्य कार्यकर्ता से सम्पर्क कर पुरूष नसबंदी कराने हेतु अपील की गई है।

  • डेंगू की रोकथाम हेतु सघन अभियान : डेंगू के प्रकरण निरंक

    डेंगू की रोकथाम हेतु सघन अभियान : डेंगू के प्रकरण निरंक

    समदर्शी न्यूज़ ब्यूरो, दुर्ग

    दुर्ग जिले के विभिन्न क्षेत्रों में जिनमें से भिलाई नगर निगम क्षेत्र व दुर्ग नगर निगम क्षेत्र में स्वास्थ्य विभाग व नगर निगम के अमले द्वारा डेंगू से संबंधित नियंत्रण व रोकथाम का कार्य निरंतर किया जा रहा है। आज 22 नवंबर 2023 को डेंगू एलिजा पॉजिटिव के प्रकरण निरंक है। सभी डेंगू संभावित मरीज के निवास क्षेत्रों में घर-घर जाकर स्वास्थ्य विभाग के मैदानी अमले द्वारा मास्किटो सोर्स रिडक्शन का कार्य दैनिक रूप से किया गया है। नगर निगम भिलाई, चरोदा रिसाली जनस्वास्थ्य विभाग, भिलाई इस्पात संयंत्र एवं नगर निगम दुर्ग की टीम के द्वारा लगातार डेंगू प्रभावित क्षेत्रों में लार्वा नष्टीकरण के लिए टेमीफॉस एवं एडिस मच्छर को नष्ट करने के लिए मेलाथियॉन से फागिंग का कार्य किया जा रहा है।

    मुख्य चिकित्सा एवं स्वास्थ्य अधिकारी डॉ. जे. पी. मेश्राम के अनुसार डेंगू नियंत्रण एवं रोकथाम हेतु दुर्ग, भिलाई, चरोदा, रिसाली नगर निगम जनस्वास्थ्य विभाग, भिलाई इस्पात संयंत्र स्वास्थ्य विभाग ग्रामीण व शहरीय की टीम द्वारा कुल 186556 घरों का सर्वेक्षण किया जा चुका है, जांच किये कुलर पानी टंकी व अन्य कंटेनर की संख्या-211397 जिनमें से 86440 खाली कराये गये। सभी कटेनरों में 119981 स्थानों में टेमीफास डालकर लार्वा का नष्टीकरण किया गया, 182591 पाम्पलेट के माध्यम से डेंगू व मलेरिया से बचाव के लिए स्वास्थ्य शिक्षा दी गयी। जिले के मुख्य चिकित्सा एवं स्वास्थ्य अधिकारी, जिला मलेरिया अधिकारी, सभी नगर निगम एवं मीडिया के द्वारा लगातार लोगों से यह अपील की जा रही है कि सप्ताह में एक दिन शुष्क दिवस के रूप में मनाया जाना डेंगू की रोकथाम एवं नियंत्रण के लिए उचित होगा। उस दिन घर के सारे कन्टेनर जैसे कुलर, पानी टंकी व अन्य जिसमें बारिश का पानी एकत्रित हो उत्तको समतल जगह में उस पानी की निकासी की जाये। सोते समय मच्छरदानी का प्रयोग डेंगू एवं मलेरिया की रोकथाम एवं नियंत्रण के लिए कारगर होगा। अपील नही मानने पर यदि किसी घर मे पहली बार लार्वा मिलता है तो नगर निगम के कर्मचारियों द्वारा समझाईश दी जाएगी और दुसरी बार लार्वा मिलने पर 500 रू. से लेकर 5000रू. तक का अर्थदंड वसूला जाएगा जिसकी जवाबदारी स्वयं की होगी। जिले के मुख्य चिकित्सा एवं स्वास्थ्य अधिकारी डॉ. जे. पी. मेश्राम एवं जिला मलेरिया अधिकारी डॉ. सी. बी. एस. बंजारे के द्वारा लोगो से यह अपील की गई है, कि बुखार आने पर मलेरिया एवं डेंगू की जाँच की जाये। डेंगू एवं मलेरिया की जाँच जिला चिकित्सालय, सिविल अस्पताल, सभी सामु.स्वा. केन्द्र व प्राथ. स्वा.के. शहरी प्राथ. स्वा. केन्द्र, उपस्वास्थ्य केन्द्र, हेल्थ एवं वेलनेस सेंटर में जॉच निःशुल्क किया जा रहा है। जाँच के उपरान्त ही डॉक्टर के परामर्श से दवा लेना उचित होगा।

  • मोतियाबिंद मुक्त बस्तर के लिए पुनः सर्वे प्रारंभ : प्रशासन की पहल से मोतियाबिंद के मरीजों को चिन्हाकित कर किया जा रहा उपचार

    मोतियाबिंद मुक्त बस्तर के लिए पुनः सर्वे प्रारंभ : प्रशासन की पहल से मोतियाबिंद के मरीजों को चिन्हाकित कर किया जा रहा उपचार

    समदर्शी न्यूज़ ब्यूरो, जगदलपुर

    हर जरूरतमंद व्यक्ति को स्वास्थ्य सुविधाओं का लाभ मिले यह शासन- प्रशासन का प्रमुख लक्ष्य रहा है इसी के तहत बस्तर जिले में नेत्र से संबंधित बीमारी मोतियाबिंद से जिले को निजात दिलाने के लिए 23 नवंबर से पुनः सघन सर्वे अभियान चलाया जा रहा है। कलेक्टर श्री विजय दयाराम के.ने स्वास्थ्य विभाग के अधिकारियों को बस्तर जिले को मोतियाबिन्द मुक्त जिला बनाने हेतु विशेष प्रयास करने के साथ-साथ नेत्र चिकित्सा के लिए विशेष अस्पताल अंबक की सुविधाएं मरीजों को जरूरत के अनुसार मिलने हेतु निर्देशित किया है। कलेक्टर के निर्देश पर पूर्व में किये गए सघन सर्वे अभियान की तरह पुनः 23 नवम्बर से 30 नवम्बर 2023 से सघन मोतियाबिन्द सर्वे अभियान किया जा रहा है। इसके लिए स्वास्थ्य विभाग के समस्त कार्यकत्ताओं एवं मितानिनों को सघन सर्वे अभियान प्रारंभ कर नियमित रिर्पोटिंग करने के साथ ही संभावित मरीजों का सत्यापन कर मेडिकल काॅलेज अस्पताल डिमरापाल एवं जिला महारानी अस्पताल में स्थित अंबक अस्पताल में आपरेशन करवाने के लिए निर्देश दिये गए हैं। ऑपरेशन के लिए मरीजों को लाने एवं घर तक पहुंचाने हेतु आवागमन सुविधा उपलब्ध कराई जाएगी।

    जिले में 23 से 30 नवम्बर 2023 तक घर-घर जाकर स्वास्थ्य कार्यकर्ता एवं मितानिनों के द्वारा सघन मोतियाबिन्द सर्वे अभियान एवं आयुष्मान कार्ड बनाने से छूटे हुए व्यक्तियों का सर्वे किया जाना है। गांवों में सर्वे कार्य हेतु पंचायत सचिवों से भी समन्वय किया जाएगा। सर्वेक्षण के दौरान आदर्श आचार संहिता के नियमों का पालन सुनिश्चित किया जाएगा।सर्वेक्षण कार्य का सफल क्रियान्वयन एवं सम्पूर्ण निगरानी खण्ड चिकित्सा अधिकारी व विकासखण्ड कार्यक्रम प्रबंधक तथा शहरी क्षेत्र में शहरी कार्यक्रम प्रबंधक के द्वारा  किया जाएगा।

    प्रशासन द्वारा इस सर्वे से पहले माह मई में भी विशेष सर्वे अभियान किया गया था जिसके तहत सातों विकासखंडों से 2859 मोतियाबिंद मरीजों का चिन्हांकन किया गया। जिसमें मई से नवम्बर माह तक विकासखंड बस्तर से 298, बकावंड से 255, बास्तानार से 247, जगदलपुर से 382, लोहंडीगुड़ा से 230, तोकापाल से 230 और दरभा से 117 मरीजों को उपचार उपरांत स्वास्थ्य लाभ हुआ। मोतियाबिंद सर्वे अभियान का लाभ जिले के अंदरूनी इलाकों के मरीजों को भी मिला। जिनमें एक देवकी ठाकुर थी जो कलेक्टर श्री विजय के विकासखंड लोहड़ीगुड़ा के दूरस्थ ग्राम हर्राकोडेर दौरे के दरमियान उनकी माताजी ने मिलकर आपरेशन की गुहार की थी। कुछ ही दिन बाद देवकी का इलाज मेडिकल कॉलेज अस्पताल में किया गया अब देवकी अपने आखों से देख सकती है। देवकी ने स्वस्थ होने के बाद कलेक्टर को पुष्प भेंटकर आभार व्यक्त भी की।

    प्रशासन द्वारा जिले को मोतियाबिंद मुक्त जिला बनाने और मरीजों को नेत्र से संबंधित बीमारियों के इलाज के लिए जिला अस्पताल में विशेष अस्पताल अंबक प्रारंभ किया गया,जिसमें अब तक लगभग 342 मरीजों का मोतियाबिंद इलाज किया गया है। इसके अलावा मेडिकल कॉलेज अस्पताल में नेत्र से संबंधित बीमारियों की भी इलाज की सुविधा दी जा रही है।

  • डॉ. भीमराव अम्बेडकर स्मृति चिकित्सालय, रायपुर : चिकित्सा महाविद्यालय में यूरोगायनेकोलॉजी पर पहला राष्ट्रीय सम्मेलन, आईएमएस यूरोग्नेकॉन 2023 का आयोजन !

    डॉ. भीमराव अम्बेडकर स्मृति चिकित्सालय, रायपुर : चिकित्सा महाविद्यालय में यूरोगायनेकोलॉजी पर पहला राष्ट्रीय सम्मेलन, आईएमएस यूरोग्नेकॉन 2023 का आयोजन !

    समदर्शी न्यूज़ ब्यूरो, रायपुर

    रायपुर :  यूरोगायनेकोलॉजी कमिटी ऑफ़ इंडियन मेनोपॉज सोसायटी एवं डिपार्टमेंट ऑफ ऑब्स एंड गायनी पंडित जवाहरलाल नेहरू स्मृति चिकित्सा महाविद्यालय रायपुर के संयुक्त तत्वावधान में आईएमएस यूरोग्नेकॉन 2023 नेशनल कॉन्फ्रेंस का आयोजन चिकित्सा महाविद्यालय के स्व. अटल बिहारी वाजपेयी सभागार में किया जा रहा है। इस दो दिवसीय कॉन्फ्रेंस में देश के विभिन्न हिस्सों से ख्यातिप्राप्त गायनेकोलॉजिस्ट शिरकत कर रहे हैं। कॉन्फ्रेंस के पहले दिन यूरोगायनेकोलॉजी पर लाइव ऑपरेटिव वर्कशॉप के अंतर्गत बाहर से आए विशेषज्ञों के द्वारा तीन महिला मरीजों की गर्भाशय एवं पेल्विक सबंधित समस्याओं की लाइव सर्जरी की गई। इन सर्जरी को ऑपरेशन थियेटर से लाइव प्रसारण के जरिये सभागार में उपस्थित डॉक्टरों ने देखा और यूरोगायनेकोलॉजी सर्जरी की बारीकियों के बारे में जानकारी प्राप्त की।

    सम्मेलन के आयोजक अध्यक्ष डॉ. पुष्पा सेठी एवं डॉ. मनोज चेलानी ने बताया कि इंडियन मेनोपॉज़ सोसाइटी के यूरोगायनेकोलॉजी के प्रथम राष्ट्रीय सम्मेलन का आयोजन राजधानी रायपुर में करना गौरव की बात है। इस सम्मेलन के पहले दिन ऑपरेटिव यूरोगायनेकोलॉजी कार्यशाला का लाइव प्रसारण हुआ और रविवार को श्रोणि (पेल्विक) की शारीरिक रचना पर कार्यशाला है। इसके साथ ही आयोजित कार्यक्रम में प्रतिभाशाली डॉक्टरों के द्वारा रंगारंग सांस्कृतिक कार्यक्रम की भी प्रस्तुति की जाएगी।

    आयोजन सचिव एवं विभागाध्यक्ष प्रसूति एवं स्त्री रोग विभाग डॉ. ज्योति जायसवाल ने बताया कि आज वाल्ट प्रोलेप्स एवं नॉन डिसेंट वैजाइनल हिस्ट्रेक्टमी के केस ऑपरेट किये गए। वाल्ट प्रोलेप्स के अंतर्गत हाई यूटेरो सेक्रल फिक्सेशन की सर्जरी डॉ. हारा पटनायक, डॉ.रुचि किशोर गुप्ता एवं डॉ. अंजुम एवं टीम के द्वारा की गई। यह ऐसा जटिल केस था, जिसमें 50 वर्षीय महिला के गर्भाशय को पूर्व में ऑपरेशन करके निकाल दिया गया था, उसके बाद बचा हुआ हिस्सा योनिमार्ग से बाहर निकल आया था। इसकी सर्जरी योनिमार्ग से की गई। वहीं नॉन डिसेंट वैजाइनल हिस्ट्रेक्टमी में डॉ. मंगेश, डॉ. तनवीर एवं टीम ने 48 वर्षीय मरीज की सर्जरी की।

    डॉ. ज्योति जायसवाल एवं डॉ.सुमा ने बताया कि महिलाओं में कई बार खांसते, छींकते समय पेशाब निकल आता है, लेकिन इस बारे में बात करने से वो झिझक या संकोच महसूस करती हैं। यही पेशाब लीक होने की यह समस्या आगे जाकर गंभीर समस्या का रूप ले लेती है। लाइव वर्कशॉप के अंतर्गत डॉ. तनवीर ने हिस्टेरोस्कोपी के बारे में विस्तार से जानकारी दी।

    कार्यक्रम की विशिष्ट अतिथि डॉ. आभा सिंह, डॉ. हारा पटनायक एवं मुख्य अतिथि अधिष्ठाता (चिकित्सा महाविद्यालय) डॉ. तृप्ति नागरिया एवं अधीक्षक (अम्बेडकर अस्पताल) डॉ. एस.बी.एस. नेताम रहे। इस सम्मेलन में बाहर से आए विशेषज्ञ डॉक्टरों में इंडियन मेनोपॉज़ सोसाइटी से डॉ. आरती गुप्ता, डॉ. बिपाशा सेन एवं डॉ. रागिनी अग्रवाल सम्मिलित हैं। 

    विदित हो कि यूरोगायनेकोलॉजी स्त्री रोग और प्रसूति विज्ञान का एक विशेष क्षेत्र है जो महिला पेल्विक चिकित्सा और पुनर्निर्माण सर्जरी से संबंधित है। इसके अंतर्गत कमजोर मूत्राशय या पेल्विक ऑर्गन प्रोलैप्स (मांसपेशियां कमजोर होने के कारण अंग का गिर जाना या लटक जाना) जैसी पेल्विक फ्लोर स्थितियों का निदान और उपचार करते हैं।

  • जिला चिकित्सालय दुर्ग के प्रसूति विभाग एक दिन में 25 मेजर आपरेशन संपादित कर नया कीर्तमान रचा

    जिला चिकित्सालय दुर्ग के प्रसूति विभाग एक दिन में 25 मेजर आपरेशन संपादित कर नया कीर्तमान रचा

    समदर्शी न्यूज़ ब्यूरो, दुर्ग

    जिला चिकित्सालय दुर्ग का स्त्री रोग विभाग कलेक्टर जिला दुर्ग के मार्गदर्शन में नयी नयी उपलब्धियां हासिल कर रहा है इसी क्रम में  09 नवंबर 2023 को जिला चिकित्सालय दुर्ग के स्त्री रोग विभाग के मेजर ओटी में कुल 25 मेजर सर्जरी किया गया है। जिसमें कुल 23 गर्भवती महिलओं को आपरेशन कर प्रसव कराया गया तथा 02 गर्भाशय का आपरेशन किया गया है, उपरोक्त समस्त आपरेशन डॉ संजय वालवेन्द्रे निःश्चेतना विशेषज्ञ एवं प्रभारी अधिकारी ओटी, डॉ बी.आर.साहू स्त्री रोग विशेषज्ञ, डॉ स्मिता स्त्री रोग विशेषज्ञ,, डॉ पूजा वर्मा पटेल निःश्चेतना विशेषज्ञ एवं गयानिक ओटी में कार्यरत स्टॉफ नर्स, पैरामेडिकल स्टॉफ एवं चतुर्थ श्रेणी कर्मचारियों के टीम द्वारा संपादित कर एक नयी उपलब्धि हासिल की है। डॉ ए.के साहू सिविल सर्जन सह मुख्य अस्पताल अधीक्षक जिला चिकित्सालय दुर्ग के द्वारा सभी विशेषज्ञ तथा नर्सिग स्टॉफ, पैरामेडिकल स्टॉफ, चतुर्थ श्रेणी कर्मचारियों को उनके द्वारा नये कीर्तिमान स्थापित कर एक दिन में 25 मेजर आपरेशन करने के लिये प्रसन्नता व्यक्त करते हुए बधाई दिया गया है।