परिसीमन को लेकर भ्रम फैलाने के प्रयासों का दावा, आदिवासी समाज से तथ्यों और संविधान पर भरोसा रखने की अपील

परिसीमन के खिलाफ आदिवासियों को गुमराह / उकसाने के प्रयास

रायपुर/जशपुर : परिसीमन को लेकर आदिवासी समाज में फैल रही आशंकाओं और चर्चाओं के बीच एक अपील जारी कर लोगों से अफवाहों पर विश्वास न करने का आग्रह किया गया है। अपील में कहा गया है कि अनुसूचित जनजातियों के राजनीतिक प्रतिनिधित्व को भारतीय संविधान के अनुच्छेद 330 और 332 के तहत संरक्षण प्राप्त है। साथ ही लोगों से जनगणना और परिसीमन की प्रक्रिया में सहयोग करने तथा किसी भी निष्कर्ष पर पहुंचने से पहले तथ्यों की जांच करने की बात कही गई है।

परिसीमन के खिलाफ कुछ निहित स्वार्थ वाले लोग यह कहकर आदिवासी समाज में भ्रम और डर फैलाने की कोशिश कर रहे हैं कि आने वाले परिसीमन से अनुसूचित जनजातियों का राजनीतिक, प्रतिनिधित्व कम हो जाएगा। आदिवासियों के धार्मिक धर्मांतरण में लगे बलों द्वारा समर्थित ऐसे लोग स्वयं को आदिवासियों का हितैषी बताते हैं, लेकिन उनके दावे तथ्यों और संवैधानिक प्रावधानों पर आधारित नही हैं। उनके दावों का कोई आधार नही है, जो दुर्भावनापूर्ण इरादों से और बिना किसी विश्वसनीय डेटा के किए गए हैं। समाज को किसी भी निष्कर्ष पर पहुंचने से पहले तथ्यों की जांच करनी चाहिए।

वास्तव में, परिसीमन भारतीय संविधान के अनुच्छेद 330 और 332 की अनदेखी नहीं कर सकता, जो स्पष्ट रूप से सुनिश्चित करते हैं कि लोकसभा और राज्य विधानसभाओं में अनुसूचित जनजातियों के लिए सीटों का आरक्षण उनकी जनसंख्या के अनुपात में होगा। 2001 की जनगणना में अनुसूचित जनजातियों की जनसंख्या लगभग 8.43 करोड़ थी, जो 2011 में बढ़कर लगभग 10.42 करोड़ हो गई। आदिवासी जनसंख्या में लगभग 23.7% की वृद्धि हुई, यह राष्ट्रीय औसत (17.7%) से 6% अधिक रही। वर्तमान जनगणना में, ST जनसंख्या लगभग 12.7 करोड़ होने की उम्मीद है। तदनुसार, लोकसभा और राज्य विधानसभाओं दोनों में ST राजनीतिक प्रतिनिधित्व में निश्चित रूप से पर्याप्त वृद्धि होगी।

इसके अलावा, चूंकि लोकसभा सीटों की संख्या 543 से बढ़ाकर 850 करने का प्रस्ताव है, इसलिए ST सीटें भी आनुपातिक रूप से (लगभग 50%) बढ़ेंगी। आदिवासी समाज को यह भी जानना चाहिए कि 2002 में संपन्न और 2008 से लागू हुए पिछले परिसीमन के बाद लोकसभा में ST के लिए आरक्षित सीटों की संख्या 41 से बढ़कर 47 हो गई थी। कई राज्यों की विधानसभाओं में भी अनुसूचित जनजातियों का प्रतिनिधित्व बढ़ा।

सही जनगणना और निष्पक्ष परिसीमन से ही किसी समुदाय को उसकी वास्तविक आबादी के अनुरूप राजनीतिक प्रतिनिधित्व मिल सकता है। भ्रम और अफवाहों में उलझने के बजाय, तथ्यों पर विश्वास करें, अफवाहों से बचें, संविधान पर भरोसा रखें और जनगणना एवं परिसीमन की प्रक्रिया में सक्रिय सहयोग करें। यही सशक्त, आत्मनिर्भर और सम्मानजनक आदिवासी समाज के मजबूत प्रतिनिधित्व और उज्ज्वल भविष्य की दिशा में सबसे महत्वपूर्ण कदम है।

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